
आत्मा की धुन
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Lyrics
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[Instrumental Intro]
[Female Aalap]
रा…म…
सीता राम… सीता राम…
जय-जय श्रीराम…
[Chorus]
रामकथा का अम्रित बरसे, मन-मंदिर मुस्काए,
सीता-राम का नाम जो गाए, भवसागर तर जाए।
बोलो राम, बोलो राम, बोलो सीताराम,
भक्तों के जीवन का सहारा, प्यारा सीताराम।
[Verse 1]
अवधपुरी के राजा दशरथ, मन में आस लगाए,
पुण्य यग्य के फल से घर में, चारों लाल थे आए।
कौशल्या के राम दुलारे, लक्ष्मण सेवा-धारी,
भरत प्रेम की निर्मल मूरत, शत्रुघ्न आग्याकारी।
विश्वामित्र के साथ गए प्रभु, रिषियों का भय टाला,
ताड़का का उद्धार किया और यग्य बचा डाला।
अहिल्या के जीवन में प्रभु ने नया सवेरा लाया,
मिथिला जाकर शिव का धनुष सहज भाव से उठाया।
[Chorus]
रामकथा का अम्रित बरसे, मन-मंदिर मुस्काए,
सीता-राम का नाम जो गाए, भवसागर तर जाए।
बोलो राम, बोलो राम, बोलो सीताराम,
भक्तों के जीवन का सहारा, प्यारा सीताराम।
[Verse 2]
जनकसुता ने राम के गले जयमाला पहनाई,
देवों ने आकाश से सुंदर फूलों की वर्षा कराई।
राम-जानकी का शुभ विवाह, मंगल गीत सुनाए,
चारों भाई चारों वधुओं संग अवधपुरी आए।
[Short Instrumental – Flute and Harmonium]
[Verse 3]
राजतिलक की शुभ बेला में भाग्य ने करवट पाई,
मंथरा की बातों में आकर कैकेयी भरमाई।
चौदह वर्षों का वन माँगा, भरत को राज दिलाया,
पिता के वचन की खातिर राम ने राजपाट ठुकराया।
सीता बोलीं, “जहाँ आप हैं, वहीं हमारा धाम,”
लक्ष्मण बोले, “सेवा में ही बीते जीवन राम।”
तीनों जब वन की ओर चले, अवधपुरी अकुलाई,
राम-वियोग में राजा दशरथ ने देह बिसराई।
[Verse 4]
भरत लौटकर सत्य जानकर रोते वन में आए,
रामचरण में गिरकर बोले, “वापस अवध को आएँ।”
धर्म निभाने राम रुके तो चरण-पादुका पाई,
सिंहासन पर उन्हें विराजित कर मर्यादा निभाई।
[Chorus]
रामकथा का अम्रित बरसे, मन-मंदिर मुस्काए,
सीता-राम का नाम जो गाए, भवसागर तर जाए।
बोलो राम, बोलो राम, बोलो सीताराम,
भक्तों के जीवन का सहारा, प्यारा सीताराम।
[Verse 5]
पंचवटी की पावन धरती पर कुटिया बनवाई,
छल से स्वर्ण-म्रिग दिखलाकर विपदा निकट बुलाई।
साधु का रूप बनाकर रावण सीता को हर लाया,
वीर जटायु ने प्राण गँवाकर अपना धर्म निभाया।
वन-वन सीता खोजते प्रभु शबरी के घर आए,
प्रेम-भरे स्वागत को पाकर उसको गले लगाए।
भक्ति कभी धन-दौलत अथवा ऊँचा कुल नहीं देखे,
निर्मल मन से जो बुलवाए, राम उसी को देखें।
[Verse 6]
रिष्यमूक पर पवनपुत्र ने राम का दर्शन पाया,
चरणों में रखकर जीवन अपना सच्चा धर्म निभाया।
सुग्रीव से मित्रता कर बाली का अंत कराया,
वानर-दल को चार दिशाओं में सीता हेतु पठाया।
रामनाम लेकर हनुमत ने सागर पार लगाया,
अशोक वाटिका में माता को प्रभु-संदेश सुनाया।
राम की मुद्रिका देकर आशा का दीप जलाया,
रावण के अभिमान के आगे सत्य का �