Back to home
Learn to sing thisKaraoke with live pitch — get a score on every lineSing →

PRO & Creator Features
Unlock Studio tools with Pro or Creator: remix and covers, photo covers, unlimited variations, edit sections and stem separation. Creator adds voice clone and lossless FLAC.
Audio2Audio Remix
Pro & Creator
Voice Clone
Creator
Create Variations
Creator only
Edit Sections
Creator only
Stem Separation
Creator only
बरसात का मौसम आया था, और गोकुल के लोग हर साल की तरह इंद्र देवता की पूजा की तैयारी कर रहे थे। घर-घर में दीये जल रहे थे, फूलों की मालाएँ बन रही थीं, और बच्चे मिठाइयों की खुशबू में खोए हुए थे। लेकिन इस बार कुछ अलग होने वाला था। नंद बाबा के द्वार पर बैठे कृष्ण ने मुस्कुराते हुए कहा, "पिता जी, हम इंद्र की पूजा क्यों करें? वे तो बादलों के देवता हैं, लेकिन असली आश्रय तो गोवर्धन पर्वत है, जो हमारी गायों को चारा देता है, हमें फल और फूल देता है।"
नंद बाबा ने सोचा, तो कृष्ण की बात में दम था। गोकुल के सारे लोग, ग्वाले और गोपियाँ, सबने फैसला किया कि इस बार वे गोवर्धन की पूजा करेंगे। सुबह होते ही सैकड़ों लोग पर्वत के पास पहुँचे। उन्होंने फूल, फल, और दूध से उसकी पूजा की। गीत गाए, घी के दीये जलाए, और अपनी गायों को प्रसाद खिलाया। गोकुल में खुशी की लहर दौड़ गई।
लेकिन ऊपर स्वर्ग में, इंद्र देवता का सिंहासन हिलने लगा। उन्होंने देखा कि उनकी पूजा बंद हो गई है, और लोग किसी पहाड़ की पूजा कर रहे हैं। उनका क्रोध आग की तरह भड़क उठा। उन्होंने गरजते हुए कहा, "ये नटखट कृष्ण मुझे सबक सिखाएगा? मैं तो बादलों का राजा हूँ। अगर मैंने बारिश रोक दी, तो सब सूख जाएँगे। लेकिन नहीं, मैं इन्हें ऐसा तूफान दूँगा कि ये मेरी शक्ति को समझ जाएँ।"
इंद्र ने अपने बादलों को बुलाया और आदेश दिया, "अभी मूसलधार बारिश करो। इतनी बारिश करो कि गोकुल की हर घास, हर पत्ता डूब जाए।" बादल गरजने लगे, बिजली चमकने लगी, और आसमान से पानी की धाराएँ बरसने लगीं। पहले तो लोगों ने सोचा, बस, थोड़ी बारिश है। लेकिन पानी और बढ़ता गया। हर घंटे, बारिश और तेज़ होती गई। गाँव की गलियों में पानी भर गया, घरों की छतें टपकने लगीं, और गायें डरकर इधर-उधर भागने लगीं। बच्चे रोने लगे, और बुजुर्ग चिंता से सिर पकड़कर बैठ गए। गोकुल में हाहाकार मच गया।
तभी नंद बाबा और गोकुल के सारे लोग भगवान कृष्ण के पास दौड़े आए। उनकी आँखों में डर और चेहरे पर चिंता साफ़ झलक रही थी। कृष्ण मुस्कुराए और बोले, "डरो मत। ये बारिश हमें कुछ नहीं कर सकती।" फिर उन्होंने वहाँ खड़े गोवर्धन पर्वत की ओर देखा। सबकी नज़रें उन पर थीं। कृष्ण ने धीरे से अपनी बाईं उंगली पर पर्वत उठा लिया। जैसे कोई फूल उठाता है। लोगों की आँखें फटी रह गईं। विशाल गोवर्धन, जिसे हाथियों की सैकड़ों टोलियाँ भी नहीं हिला सकती थीं, वो एक बालक की उंगली पर टिक गया।
कृष्ण ने सबको आवाज़ दी, "जल्दी आओ, पर्वत के नीचे शरण लो।" गोकुल के लोग, गायें, बछड़े, बूढ़े और बच्चे सब दौड़कर पर्वत के नीचे आ गए। बारिश की मोटी-मोटी बूँदें पर्वत की चट्टानों से टकराकर छिटकने लगीं, लेकिन अंदर एक भी बूँद नहीं पहुँची। लोगों को लगा जैसे किसी ने उन्हें अपनी छाती से लगा लिया हो। सात दिन और सात रात तक इंद्र ने अपना कोप बरसाया, लेकिन गोकुल का एक भी बच्चा भीगा नहीं। सातवें दिन इंद्र ने देखा कि उसका क्रोध उस बालक के सामने कुछ भी नहीं है। उसकी आँखें खुलीं। उसने अपनी बारिश रोकी और आकाश से उतरकर कृष्ण के पास आया। उसने हाथ जोड़कर कहा, "हे प्रभु, मैंने अहंकार में आकर गलती की। आप तो स्वयं सृष्टि के रचयिता हैं। मुझे क्षमा करें।" कृष्ण ने मुस्कुराकर पर्वत को धीरे से ज़मीन पर रखा और इंद्र को आशीर्वाद दिया। गोकुल के लोगों ने भगवान की महिमा देखी और उनके चरणों में सिर झुकाया। तब से हर साल गोवर्धन पूजा होती है, और ये कथा याद दिलाती है कि सच्चा भरोसा भगवान पर हो तो कोई भी तूफ़ान हमें हिला नहीं सकता।