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Echoes Of Thunder
Rock

Echoes Of Thunder

Krish OateKrish Oate
0 likes1 plays4:25
Style: Heavy bass, male vocal, drums, epic
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[Verse]

सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा । बिकट रूप धरि लंक जरावा ।। नौ ।। भीम रूप धरि असुर सँहारे । रामचंद्र के काज सँवारे ।। दस ।। लाय सजीवन लखन जियाये । श्रीरघुबीर हरषि उर लाये ।। ग्यारह ।। रघुपति कीन्ही बहुत बडाई । तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई ।। बारह ।। सहस बदन तुम्हरो जस गावैं । अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं ।। तेरह ।। सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा । नारद सारद सहित अहीसा ।। चौदह ।। जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते । कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते ।। पंद्रह ।। तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा । राम मिलाय राज पद दीन्हा ।। सोलह ।। तुम्हरो मन्त्र बिभीषन माना । लंकेस्वर भए सब जग जाना ।। सत्रह ।। जुग सहस्र जोजन पर भानू । लील्यो ताहि मधुर फल जानू ।। अठारह ।। प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं । जलधि लांघि गये अचरज नाहीं ।। उन्नीस ।। दुर्गम काज जगत के जेते । सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते ।। बीस ।। राम दुआरे तुम रखवारे । होत न आग्या बिनु पैसारे ।। इक्कीस ।। सब सुख लहै तुम्हारी सरना । तुम रच्छक काहू को डर ना ।। बाईस ।। आपन तेज सम्हारो आपै । तीनों लोक हाँक ते काँपै ।। तेईस ।। भूत पिसाच निकट नहिं आवै । महाबीर जब नाम सुनावै ।। चौबीस ।। नासै रोग हरै सब पीरा । जपत निरंतर हनुमत बीरा ।। पच्चीस ।। संकट तें हनुमान छुडावै । मन क्रम बचन ध्यान जो लावै ।। छब्बीस ।। सब पर राम तपस्वी राजा । तिन के काज सकल तुम साजा ।। सत्ताईस ।। और मनोरथ जो कोइ लावै । सोइ अमित जीवन फल पावै ।। अट्ठाईस ।। चारों जुग परताप तुम्हारा । है परसिद्ध जगत उजियारा ।। उनतीस ।। साधु संत के तुम रखवारे । असुर निकंदन राम दुलारे ।। तीस ।। अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता । अस बर दीन जानकी माता ।। इकतीस ।। राम रसायन तुम्हरे पासा । सदा रहो रघुपति के दासा ।। बत्तीस ।। तुम्हरे भजन राम को पावै । जनम जनम के दुख बिसरावै ।। तैंतीस ।। अंत काल रघुबर पुर जाई । जहाँ जन्म हरि-भक्त कहाई ।। चौंतीस ।। और देवता चित्त न धरई । हनुमत सेइ सर्ब सुख करई ।। पैंतीस ।। संकट कटै मिटै सब पीरा । जो सुमिरै हनुमत बलबीरा ।। छत्तीस ।। जै जै जै हनुमान गोसाई । क्रिपा करहु गुरु देव की नाई ।। सैंतीस ।। जो सत बार पाठ कर कोई । छूटहि बंदि महा सुख होई ।। अड़तीस ।। जो यह पढै हनुमानचालीसा । होय सिद्धि साखी गौरीसा ।। उनतालीस ।। तुलसीदास सदा हरि चेरा । कीजै नाथ ह्रिदय महँ डेरा ।। चालीस ।। दोहा पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप । राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सूर भूप ।।

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