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रामायण: घर-घर की कथा

रामायण: घर-घर की कथा

Aakash SinghAakash Singh
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Style: Ramayan ki poori katha — Shri Ram ke janm se lekar Lanka vijay aur Ayodhya wapsi tak, bachchon aur parivaar ke liye

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बहुत समय पहले की बात है, जब धरती पर धर्म की ज्योति को फिर से जलाने के लिए प्रभु ने मन बनाया। उस समय अयोध्या नगरी थी, जो अपनी शोभा और सुख-समृद्धि से सारे संसार में मशहूर थी। वहाँ राजा दशरथ राज करते थे। वे इतने न्यायप्रिय और दयालु थे कि उनकी प्रजा उन्हें पिता से भी बढ़कर मानती थी। परंतु राजा के जीवन में एक गहरा दुख छिपा था। उनके चारों ओर धन, वैभव और शक्ति का भंडार था, लेकिन उनके घर में संतान का सुख नहीं था। कोई पुत्र उनकी गोद को खाली रहने देता था, और यही दुख उनके मन में दिन-रात जलता रहता था। एक दिन उन्होंने अपने प्रिय मंत्री और गुरु वशिष्ठ जी को बुलाया। गुरु वशिष्ठ ने उनके मन की व्यथा देखकर कहा, “राजन, आपको पुत्र प्राप्ति के लिए पुत्रकामेष्टि यज्ञ करवाना चाहिए। इससे आपकी कुल और क्षत्रियों की परंपरा धर्म से फलेगी।” राजा ने तुरंत आदेश दिया। ऋषि श्रृंगी को यज्ञ का आयोजन सौंपा गया। चारों ओर शुद्धता और भक्ति का माहौल बन गया। यज्ञ की वेदी पर आहुतियाँ पड़ने लगीं, और आकाश से देवताओं का आशीर्वाद बरसने लगा। उसी यज्ञ से प्रकट हुआ एक दिव्य पात्र, जिसमें खीर थी। राजा ने उसे अपनी तीनों रानियों में बाँट दिया—कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा को। सबने विधि-विधान से वह प्रसाद ग्रहण किया, और हर सुबह आशा का उजाला उनके घर में बढ़ने लगा। राजा दशरथ की तपस्या और अयोध्या की प्रजा के आशीर्वाद से संसार ने एक नई चेतना का अनुभव किया। यह कथा की शुरुआत थी, जिसकी राहें बहुत दूर तक जाती थीं—अयोध्या से वनों, वनों से लंका और फिर वापस घर तक। बस रुकिए, और सुनिए। यह वही समय था, जब अयोध्या की रानियों की गोद खिल उठी। देवी कौशल्या ने जन्म दिया श्री राम को, जो स्वयं विष्णु के अवतार थे। देवी कैकेयी के गर्भ से भरत का जन्म हुआ, और देवी सुमित्रा ने जुड़वाँ पुत्रों लक्ष्मण और शत्रुघ्न को जन्म दिया। चारों राजकुमारों के जन्म से अयोध्या की हर गली में खुशियाँ छा गईं। दीप जल उठे, मिठाइयाँ बाँटी गईं, और प्रजा ने एक स्वर में जय-जयकार की। बचपन में ही चारों भाई एक-दूसरे के पूरक थे। राम सबके प्रिय, भरत विनम्र, लक्ष्मण राम की छाया की तरह साथ रहने वाले, और शत्रुघ्न भरत के संगी। गुरु वशिष्ठ के आश्रम में उन्होंने वेद, शास्त्र और धनुर्विद्या की शिक्षा ली। राम का तेज और लक्ष्मण की निपुणता देखकर सभी चकित रह जाते थे। एक दिन आश्रम में महर्षि विश्वामित्र पधारे। उन्होंने राजा दशरथ से कहा कि उनके यज्ञ को राक्षस भंग करते हैं, और वे राम को अपने साथ ले जाना चाहते हैं। राजा दशरथ हिचकिचाए, पर विश्वामित्र के आग्रह पर राम और लक्ष्मण उनके साथ चल दिए। रास्ते में विश्वामित्र ने उन्हें दिव्य मंत्र सिखाए, और यज्ञ की रक्षा के दौरान राम ने ताड़का और सुबाहु जैसे राक्षसों का वध किया। यही वह क्षण था, जब राम का पराक्रम संसार के सामने आया। विश्वामित्र मुनि राम और लक्ष्मण को लेकर मिथिला पहुँचे। वहाँ राजा जनक ने उनका बड़े सम्मान से स्वागत किया। राजा जनक की बेटी सीता थीं, जो माता धरती से प्राप्त हुई थीं और उनका स्वयंवर रखा गया था। स्वयंवर में शर्त थी कि जो भी शिव जी का विशाल धनुष उठाकर उसकी प्रत्यंचा चढ़ाएगा, वही सीता का वर बनेगा। कई राजा और महाराजा आए, पर धनुष को हिला भी नहीं पाए। जब राम की बारी आई, तो उन्होंने सहज भाव से धनुष उठाया और प्रत्यंचा चढ़ाते ही धनुष टूट गया। उसकी ध्वनि से पूरा सभागार गूँज उठा। सीता की माला राम के गले में पड़ी, और चारों ओर जय-जयकार होने लगी। राजा जनक ने अपनी बेटी का हाथ राम को सौंप दिया। साथ ही, उर्मिला का विवाह लक्ष्मण से, मांडवी का भरत से और श्रुतिकीर्ति का शत्रुघ्न से हुआ। चारों भाइयों की शादी एक साथ धूमधाम से हुई। अयोध्या में खुशियों का माहौल था। राम और सीता का जीवन सुखमय लग रहा था, पर नियति को कुछ और ही मंज़ूर था। उसी खुशी के बीच एक ऐसा मोड़ आने वाला था, जो सब कुछ बदल देगा। राजा दशरथ ने सोचा, अब समय आ गया है राम को युवराज बनाने का। पूरी अयोध्या में खुशियाँ थीं, लेकिन कैकेयी की दासी मंथरा के मन में ईर्ष्या का जहर भर गया। उसने कैकेयी को समझाया कि अगर राम राजा बने तो भरत का क्या होगा। कैकेयी ने पुराने दो वरदान याद कराए और दशरथ से माँग लिया—राम को चौदह साल का वनवास और भरत को राजगद्दी। दशरथ का हृदय टूट गया, पर वचन के आगे उनका कुछ न चला। राम ने पिता का वचन रखने के लिए बिना किसी दुःख के वन जाना स्वीकार कर लिया। सीता और लक्ष्मण भी उनके साथ चले। अयोध्या की प्रजा रोती रही, पर राम चल दिए। वन में उन्होंने साधुओं से भेंट की, और आगे बढ़ते हुए चित्रकूट पहुँचे, जहाँ उन्होंने पर्णकुटी बनाई। भरत, जो अपने नाना के घर गए थे, जब लौटे तो सब कुछ बदला पाया। उन्होंने माँ कैकेयी को समझाया, पर राम का संकल्प अटल था। भरत ने राम के चरणों की पादुका ली और उसे राजगद्दी पर बिठाकर अयोध्या की ओर लौट गए। वे राम नाम की तपस्या में लीन रहे। फिर राम, सीता और लक्ष्मण दंडक वन गए और पंचवटी में झोपड़ी बनाई। वहीं एक दिन रावण की बहन शूर्पणखा आई। उसने राम को देखकर मोहित हो गई और विवाह का प्रस्ताव रखा। राम ने मुस्कुराकर कहा, "मैं तो विवाहित हूँ, तुम लक्ष्मण से बात करो।" लक्ष्मण ने भी मना कर दिया। क्रोध में शूर्पणखा सीता पर झपटी, और लक्ष्मण ने उसकी नाक काट दी। शूर्पणखा चीखती हुई लंका की ओर भागी, और इसी घटना ने आने वाले भीषण संग्राम की नींव रखी। शूर्पणखा ने जाकर अपने भाई रावण को सब बात बताई। रावण का क्रोध सातवें आसमान पर पहुँचा। उसने सोचा, मेरी बहन का अपमान करने वाले इस राजकुमार को सबक सिखाना ही होगा। रावण ने एक चाल चली। उसने मारीच नामक राक्षस को सोने के हिरण का रूप धरने को कहा। वह सुनहरा हिरण सीता के सामने आया। सीता उसकी सुंदरता देखकर मोहित हो गईं। उन्होंने राम से उसे पकड़ने का आग्रह किया। राम हिरण के पीछे दौड़े। दूर जाकर मारीच ने राम की आवाज़ की नकल करके चिल्लाया, "हा सीता! हा लक्ष्मण!" यह सुनकर सीता घबरा गईं। उन्होंने लक्ष्मण को राम की सहायता के लिए भेज दिया। जाने से पहले लक्ष्मण ने सीता की रक्षा के लिए एक रेखा खींची और कहा, "इस रेखा को पार न करना।" लक्ष्मण के जाते ही रावण साधु के भेष में आया। उसने दान की भिक्षा माँगी। सीता ने रेखा को सम्मान देते हुए उसके भीतर से ही भिक्षा देना चाहा, पर रावण नहीं माना। जब सीता रेखा के पार गईं, तो रावण ने अपना असली रूप दिखाया और उन्हें पकड़कर अपने पुष्पक विमान में बिठा लिया। आकाश में जाते समय सीता की चीखें सुनकर जटायु नामक गिद्धराज ने रावण को रोकने की कोशिश की। बूढ़े जटायु ने बहुत वीरता से युद्ध किया, पर रावण ने उनके पंख काट दिए। जटायु धरती पर गिर पड़े। रावण सीता को लेकर लंका चला गया। सीता ने रास्ते में वन के पक्षियों को अपनी बात बताने को कहा। राम और लक्ष्मण सीता की खोज में निकले। रास्ते में उन्हें घायल जटायु मिले। जटायु ने काँपती आवाज़ में बताया, "रावण ने सीता को दक्षिण दिशा की ओर ले गया।" यह कहकर जटायु ने प्राण त्याग दिए। राम ने उनका अंतिम संस्कार किया और आगे बढ़े। दक्षिण दिशा में उनकी मुलाकात हुई सुग्रीव से, जो वानरराज थे। सुग्रीव ने बताया कि उन्होंने सीता को ले जाते हुए रावण को देखा था। राम ने सुग्रीव की मित्रता की। बदले में राम ने सुग्रीव के भाई बाली का वध करके उन्हें राज्य वापस दिलाया। सुग्रीव ने अपनी विशाल वानर सेना सीता की खोज में लगा दी। चारों दिशाओं से वानर लौटे, पर कोई सफलता नहीं मिली। तब समुद्र की ओर भेजे गए वानरों ने बताया कि दूर लंका में सीता दिखाई दी हैं। तब हनुमान जी ने राम जी से कहा, “मैं समुद्र पार करके लंका जाऊँगा और माता सीता का पता लगाऊँगा।” राम जी ने उन्हें आशीर्वाद दिया। हनुमान जी ने अपना रूप बड़ा किया और एक छलांग में समुद्र पार कर गए। लंका पहुँचकर उन्होंने अशोक वाटिका में सीता जी को देखा। सीता जी के पास जाकर उन्होंने राम जी की अंगूठी दिखाई और कहा, “माता, प्रभु आपका इंतज़ार कर रहे हैं।” सीता जी ने राहत की साँस ली और हनुमान जी को चूड़ामणि देकर भेजा। हनुमान जी ने लंका में रावण को भी देखा और उसे समझाने की कोशिश की, पर रावण नहीं माना। तब हनुमान जी ने लंका में आग लगा दी और वापस आ गए। सीता का पता चलते ही राम जी ने युद्ध की तैयारी शुरू कर दी। विशाल वानर सेना समुद्र के किनारे जमा हुई। सेना को पार कराने के लिए समुद्र देवता से प्रार्थना की गई। तब नल और नील नामक वानरों ने पत्थरों पर राम जी का नाम लिखकर पुल बनाना शुरू किया। पत्थर पानी पर तैरने लगे। कुछ ही दिनों में समुद्र पर अद्भुत पुल बन गया। पूरी वानर सेना ने जय श्री राम का नारा लगाते हुए लंका की ओर कदम बढ़ाया। लंका की ओर बढ़ती वानर सेना को देखकर रावण के महल में हलचल मच गई। विभीषण ने राम जी से कहा, यह युद्ध अन्याय के खिलाफ है। रावण ने सीता माता को छोड़ने से इनकार कर दिया, और युद्ध का बिगुल बज उठा। पहले अंगद जी रावण के दरबार में गए, पर बात नहीं बनी। फिर मेघनाद ने लक्ष्मण जी पर शक्ति का प्रहार किया, और वे मूर्छित हो गए। हनुमान जी संजीवनी बूटी लाने चले, और लक्ष्मण जी की जान बच गई। युद्ध तब और भी भयंकर हो गया। रावण ने अपनी सारी माया और शक्ति लगा दी। अंत में राम जी और रावण का आमना-सामना हुआ। ब्रह्मास्त्र की प्रार्थना करते हुए राम जी ने रावण के हृदय में बाण मारा। रावण धरती पर गिरा, और उसके मुख से निकला, हे राम, मैंने जीवन भर तुमसे शत्रुता की, पर अंत में तुम ही मेरे मोक्ष के कारण बने। तब राम जी ने विभीषण को लंका का राज्य सौंपा। सीता माता को लाने के लिए राम जी ने अग्नि परीक्षा रचाई। सीता माता ने अग्नि में प्रवेश किया, और अग्नि देवता ने उन्हें सुरक्षित बाहर निकाल लिया। यह देखकर सबकी आँखों में खुशी के आँसू थे। राम जी और सीता माता का मिलन हुआ, और पूरी वानर सेना ने जय श्री राम का उद्घोष किया। अयोध्या की ओर जब राम जी की पुष्पक विमान उड़ी, तो हवा में खुशबू घुल गई। पूरी प्रजा ने सड़कों को फूलों से सजाया था। राम जी, सीता माता और लक्ष्मण जी को देखकर हर आँख नम हुई। भरत जी ने राम जी के चरणों में सिर झुकाया और कहा, "अब मुझे अपना वचन निभाने दीजिए।" उन्होंने राम जी की खड़ाऊँ को अपने सिर पर रखकर कहा, "अयोध्या की गद्दी आपकी है, और मैंने तो केवल आपके राज्य की रक्षा की है।" राम जी का राज्याभिषेक हुआ। गुरु वशिष्ठ ने मंत्रों से उनका अभिषेक किया। पूरी अयोध्या दीपों से जगमगा उठी। लोगों के चेहरे पर खुशी थी, और हर घर में मिठाइयाँ बंटी। राम जी ने सबको गले लगाया — वानर सेना को, सुग्रीव को, हनुमान जी को और अयोध्या के हर नागरिक को। रामराज्य की शुरुआत हुई। ऐसा राज्य, जहाँ कोई भय नहीं, कोई दुख नहीं। धर्म की जीत हुई, और अधर्म का नाश हुआ। राम जी की कथा सदियों से गाई जा रही है, और हर घर में यही कहानी सुनाई जाती है। जय श्री राम!

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