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Anuradha ChhetriAnuradha Chhetri
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Style: female vocal

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श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि। बरनउँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि ॥ बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार। बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार ॥ जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुं लोक उजागर ॥ रामदूत अतुलित बल धामा। अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा ॥ महाबीर बिक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी ॥ कंचन बरन बिराज सुबेसा। कानन कुंडल कुंचित केसा ॥ हाथ बज्र अरु ध्वजा बिराजे। कांधे मुँज जनेऊ साजे ॥ संकर सुवन केसरी नंदन। तेज प्रताप महा जग वंदन ॥ विद्यावान गुनी अति चातुर। राम काज करिबे को आतुर ॥ प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया। राम लखन सीता मन बसिया ॥ सूक्ष्म रूप धरि सियहि दिखावा। विकट रूप धरि लंक जरावा ॥ भीम रूप धरि असुर संहारे। रामचंद्र के काज संवारे ॥ लाय सजीवन लखन जियाए। श्री रघुवीर हरषि उर लाए ॥ रप्पह कीन्ह बहुत बड़ाई। तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई ॥ सहस बदन तुम्हरो जस गावैं। अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं ॥ सनकादिक ब्रह्मा/ब्रह्म मुनिसार। नारद सारद सहित अमार ॥ जम कुबेर दिक्पाल जहाँ ते। कवि कोविद कहि सकé कहाँ ते ॥ तुम सुग्रीवहि कीन्ह उपारा। राम मिलाय राज पद दीन्हा ॥ तुम्हरो मन्त्र विभीषन माना। लंकेश्वर भए सब जग जाना ॥ युग सहस्र योजन पर भानू। लील्यो ताहि मधुर फल जानू ॥ प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं। जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं ॥ दुर्गम काज जगत के जेते। सुगम अनुग्रह तुमरे तेते ॥ राम दुआरे तुम रखवारे। होत न आज्ञा बिनु पैसारे ॥ सब सुख लहै तुम्हारी शरना। तुम रक्षक काहू को डरना ॥ आपन तेज संहारो आपै। तीनों लोक हाँक ते काँपै ॥ भूत पिशाच निकट नहीं आवै। महावीर जब नाम सुनावै ॥ नासे रोग हरै सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा ॥ संकट ते हनुमान छुड़ावै। मन क्रम वचन ध्यान जो लावै ॥ सब पर राम तपस्वी राजा। तिन के काज सकल तुम साजा ॥ और मनोरथ जो कोई लावै। सोइ अमित जीवन फल पावै ॥ चारों जुग परताप तुम्हारा। है परसिद्ध जगत उजियारा ॥ साधु संत के तुम रखवारे। असुर निकंदन राम दुलारे ॥ अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता। अस वर दीन जानकी माता ॥ राम रसायन तुम्हारे पासा। सदा रहो रघुपति के दासा ॥ तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम जनम के दुख बिसरावै ॥ अंतकाल रघुवरपुर जाई। जहाँ जन्म हरी-भक्त कहाई ॥ और देवता चित्त न धरई। हनुमत से सर्व सुक करई ॥ संकट कटै मिटै सब पीरा। जो सुमिरे हनुमत बलबीरा ॥ जय जय जय हनुमान गोसाईं। कृपा करहु गुरुदेव की नाईं ॥ जो सत बार पाठ कर कोई। छूटहि बंदी महासुख होई ॥ जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा। होय सिद्धि साखी गौरीसा ॥ तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय महँ डेरा ॥

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