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Silent Tanpura Veil
Devotional

Silent Tanpura Veil

D
David
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Style: Vedic Sanskrit chanting, calm and grounded voice, steady uniform tempo around 90 BPM, flat monotone recitation with minimal melody, soft tanpura drone only, no drums, no percussion, no instrumental solos, no key or tempo change, no backing vocals, clear pronunciation, devotional, meditative [Vedic chant, spoken-sung, uniform tempo, same pitch throughout] Sing every line exactly as written. Do not skip, repeat, rearrange, translate or add any words. No intro, no outro, no instrumental break, no chorus.
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Lyrics

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ॐ नमस्ते गणपतये।

त्वमेव प्रत्यक्षं तत्वमसि।।

त्वमेव केवलं कर्त्तासि।

त्वमेव केवलं धर्तासि।।

त्वमेव केवलं हर्तासि।

त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि।।

त्वं साक्षादत्मासि नित्यम्।

रितं वच्मि।। सत्यं वच्मि।।

अव त्वं मां।। अव वक्तारं।।

अव श्रोतारं। अवदातारं।।

अव धातारम अवानूचानमवशिष्यं।।

अव पश्चातात्।। अवं पुरस्तात्।।

अवोत्तरातात्।। अव दक्षिणात्तात्।।

अव चोर्ध्वात्तात।। अवाधरात्तात।।

सर्वतो मां पाहिपाहि समंतात्।।

त्वं वाङग्मयचस्त्वं चिन्मय।

त्वं वाङग्मयचस्त्वं ब्रह्ममय:।।

त्वं सच्चिदानंदा द्वितियोसि।

त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्मासि।

त्वं ग्यानमयो विग्यानमयोसि।

सर्व जगदिदं त्वत्तो जायते।

सर्व जगदिदं त्वत्तस्तिष्ठति।

सर्व जगदिदं त्वयि लयमेष्यति।।

सर्व जगदिदं त्वयि प्रत्येति।।

त्वं भूमिरापोनलोनिलो नभ:।।

त्वं चत्वारिवाक्पदानी।।

त्वं गुणयत्रयातीत: त्वमवस्थात्रयातीत:।

त्वं देहत्रयातीत: त्वं कालत्रयातीत:।

त्वं मूलाधार स्थितोसि नित्यं।

त्वं शक्ति त्रयात्मक:।।

त्वां योगिनो ध्यायंति नित्यम्।

त्वं शक्तित्रयात्मक:।।

त्वां योगिनो ध्यायंति नित्यं।

त्वं ब्रह्मा त्वं विष्णुस्त्वं रुद्रस्त्वं इन्द्रस्त्वं अग्निस्त्वं।

वायुस्त्वं सूर्यस्त्वं चंद्रमास्त्वं ब्रह्मभूर्भुव: स्वरोम्।।

गणादिं पूर्वमुच्चार्य वर्णादिं तदनंतरं।।

अनुस्वार: परतर:।। अर्धेन्दुलसितं।।

तारेण रिद्धं।। एतत्तव मनुस्वरूपं।।

गकार: पूर्व रूपं अकारो मध्यरूपं।

अनुस्वारश्चान्त्य रूपं।। बिन्दुरूत्तर रूपं।।

नाद: संधानं।। संहिता संधि: सैषा गणेश विद्या।।

गणक रिषि: निच्रिद्रायत्रीछंद:।। गणपति देवता।।

ॐ गं गणपतये नम:।।

एकदंताय विद्महे। वक्रतुण्डाय धीमहि तन्नोदंती प्रचोद्यात।।

एकदंत चतुर्हस्तं पारामंकुशधारिणम्।।

रदं च वरदं च हस्तै र्विभ्राणं मूषक ध्वजम्।।

रक्तं लम्बोदरं शूर्पकर्णकं रक्तवाससम्।।

रक्त गंधानुलिप्तागं रक्तपुष्पै सुपूजितम्।।

भक्तानुकंपिन देवं जगत्कारणम्च्युतम्।।

आविर्भूतं च स्रिष्टयादौ प्रक्रितै: पुरुषात्परम।।

एवं ध्यायति यो नित्यं स योगी योगिनांवर:।।

नमो व्रातपतये नमो गणपतये।। नम: प्रथमपत्तये।।

नमस्तेस्तु लंबोदारायैकदंताय विघ्ननाशिने शिव सुताय।

श्री वरदमूर्तये नमोनम:।।

एतदथर्वशीर्ष योधीते।। स: ब्रह्मभूयाय कल्पते।।

स सर्वविघ्नैर्न बाध्यते स सर्वत: सुख मेधते।।

सायमधीयानो दिवसक्रितं पापं नाशयति।।

प्रातरधीयानो रात्रिक्रितं पापं नाशयति।।

सायं प्रात: प्रयुंजानो पापोद्भवति।

सर्वत्राधीयानोपविघ्नो भवति।।

धर्मार्थ काममोक्षं च विदंति।।

इदमथर्वशी

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