
Eternal Serenade
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Lyrics
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जहाँ कभी सूर्यास्त के बाद, पानी भी न पीते थे लोग,
संस्कारों की छांव तले, पलते थे सारे संयोग।
आज उसी चौखट पर देखो, महफिल और जाम सजे हैं,
अपनों की इस बदली चाल पर, आँसू चुपचाप बहे हैं।
कभी जहाँ घरों में होती, आयम्बिल की ओली पावन,
तप-त्याग की महिमा से, महकता था कण-कण और आंगन।
आज हरी और कंदमूल की, कोई पाबंदी नहीं यहाँ,
त्याग मार्ग को भूल चुके हैं, जाने कैसी चली हवा।
जहाँ की माताएँ-बहनें, श्रीपाल-मैना की गाथा गातीं,
शील और संयम के व्रत से, जीवन की नैया तर जातीं।
आज वहीँ की नारी शक्ति, डांडिया-रास में मगन दिखे,
संस्कारों के पन्ने पलटकर, नए रंग में रंगें दिखे।
भिसी पार्टी, किटी पार्टी, दौर नए ये चल निकले,
नाम बदल-बदल कर सारे, शौक नए सब पल निकले।
धर्म का केवल नाम बचा है, आचरण कहीं खोया है,
यह सब देख आज हर संतों का, मन भीतर से रोया है।
दूसरों की क्या बात कहें अब, जैन स्वयं ये सब करते हैं,
धर्म-ध्वजा को थामने वाले, खुद मर्यादा से डरते हैं।
इससे केवल नाम न बिगड़े, अपनी संस्क्रिति का प्यारे,
मिट जाएंगे मान पूर्वजों के, जिनके थे हम दुलारे।
जागो जैन! अब भी समय है, अपनी मूल पहचान बचा लो,
संयम, त्याग और अहिंसा को, फिर से गले लगा लो।
नाम जैन का ऊँचा कर दो, कर्मों से श्र्रिंगार करो,
अपने पुरखों के सपनों का, फिर से नया संसार धरो।