
Hanuman Ki Jai
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पूजा जप तप नेम अचारा । नहिं जानत हौं दास तुम्हारा ॥
बन उपबन मग गिरि ग्रिह माहीं । तुम्हरे बल हौं डरपत नाहीं ॥
जय अंजनि कुमार बलवन्ता । शंकरसुवन बीर हनुमन्ता ॥
बदन कराल काल-कुल-घालक । राम सहाय सदा प्रतिपालक ॥
भूत, प्रेत, पिसाच निसाचर । अगिन बेताल काल मारी मर ॥
इन्हें मारू, तोहि सपथ राम की । राखउ नाथ मरजाद नाम की ॥
जनकसुता हरि दास कहावौ । ताकी सपथ बिलंब न लावौ ॥
जै जै जै धुनि होत अकासा । सुमिरत होय दुसह दुख नासा ॥
चरन पकरि, कर जोरि मनावौं । यहि औसर अब केहि गोहरावौं ॥
उठु, उठु, चलु, तोहि राम दुहाई । पायँ परौं, कर जोरि मनाई ॥
ॐ चं चं चं चं चपल चलंता । ॐ हनु हनु हनु हनु हनुमंता ॥
ॐ हं हं हाँक देत कपि चंचल । ॐ सं सं सहमि पराने खलदल ॥
अपने जन को तुरत उबारौ । सुमिरत होय आनंद हमारौ ॥
ताते विनती करौं पुकारी । हरहु सकल दुःख विपति हमारी ॥
ऐसौ बल प्रभाव प्रभु तोरा । कस न हरहु दुःख संकट मोरा ॥
हे बजरंग, बाण सम धावौ । मेटि सकल दुःख दरस दिखावौ ॥
हे कपिराज काज कब ऐहौ । अवसर चूकि अन्त पछतैहौ ॥
जन की लाज जात ऐहि बारा । धावहु हे कपि पवन कुमारा ॥
जयति जयति जै जै हनुमाना । जयति जयति गुण ग्यान निधाना ॥
जयति जयति जै जै कपिराई । जयति जयति जै जै सुखदाई ॥
जयति जयति जै राम पियारे । जयति जयति जै सिया दुलारे ॥
जयति जयति मुद मंगलदाता । जयति जयति त्रिभुवन विख्याता ॥
ऐहि प्रकार गावत गुण शेषा । पावत पार नहीं लवलेषा ॥
राम रूप सर्वत्र समाना । देखत रहत सदा हर्षाना ॥
विधि शारदा सहित दिनराती । गावत कपि के गुन बहु भांति ॥
तुम सम नहीं जगत बलवाना । करि विचार देखौं विधि नाना ॥
यह जिय जानि शरण तब आई । ताते विनय करौं चित लाई ॥
सुनि कपि आरत वचन हमारे । मेटहु सकल दुःख भ्रम भारे ॥
एहि प्रकार विनती कपि केरी । जो जन करैं लहै सुख ढेरी ॥
याके पढ़त वीर हनुमाना । धावत बाण तुल्य बनवाना ॥
मेटत आए दुःख क्षण माहिं । दै दर्शन रघुपति ढिग जाहीं ॥
पाठ करै बजरंग बाण की । हनुमत रक्षा करै प्राण की ॥
डीठ, मूठ, टोनादिक नासै । परक्रित यंत्र मंत्र नहीं त्रासे ॥
भैरवादि सुर करै मिताई । आयुस मानि करै सेवकाई ॥
प्रण कर पाठ करें मन लाई । अल्प-म्रित्यु ग्रह दोष नसाई ॥
आव्रित ग्यारह प्रतिदिन जापै । ताकी छांह काल नहिं चापै ॥
दै गूगुल की धूप हमेशा । करै पाठ तन मिटै कलेषा ॥
यह बजरंग बाण जेहि मारे । ताहि कहौ फिर कौन उबारे ॥
शत्रु समूह मिटै सब आपै । देखत ताहि सुरासुर कांपै ॥
तेज प्रताप बुद्धि अधिकाई । रहै सदा कपिराज सहाई ॥)
यह बजरंग-बाण जेहि मारै । ताहि कहौ फिरि कवन उबारै ॥
पाठ करै बजर