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Shanti Ki Pukaar
Acoustic

Shanti Ki Pukaar

A
Andy
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Style: Indian female voice, devotional, acoustic, soulful, peaceful, medium tempo, uniform pitch
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Lyrics

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या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

नमो नमो दुर्गे सुख करनी ।

नमो नमो अंबे दुःख हरनी ॥

निरंकार है ज्योति तुम्हारी ।

तिहू लोक फैली उजियारी ॥

शशि ललाट मुख महाविशाला ।

नेत्र लाल भ्रिकुटि विकराला ॥

रूप मातु को अधिक सुहावे ।

दरश करत जन अति सुख पावे ॥

तुम संसार शक्ति लय कीना ।

पालन हेतु अन्न धन दीना ॥

अन्नपूर्णा हुयि जग पाला ।

तुम ही आदि सुंदरी बाला ॥

प्रलयकाल सब नाशन हारी ।

तुम गौरी शिव शंकर प्यारी ॥

शिव योगी तुम्हरे गुण गावेम् ।

ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावेम् ॥

रूप सरस्वती का तुम धारा ।

दे सुबुद्धि रिषि मुनिन उबारा ॥

धरा रूप नरसिंह को अंबा ।

परगट भयि फाड के खंबा ॥

रक्षा कर प्रह्लाद बचायो ।

हिरण्याक्ष को स्वर्ग पठायो ॥

लक्ष्मी रूप धरो जग माहीम् ।

श्री नारायण अंग समाहीम् ॥

क्षीरसिंधु में करत विलासा ।

दयासिंधु दीजै मन आसा ॥

हिंगलाज में तुम्हीं भवानी ।

महिमा अमित न जात बखानी ॥

मातंगी धूमावति माता ।

भुवनेश्वरी बगला सुखदाता ॥

श्री भैरव तारा जग तारिणी ।

छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी ॥

केहरि वाहन सोह भवानी ।

लांगुर वीर चलत अगवानी ॥

कर में खप्पर खडग विराजे ।

जाको देख काल डर भाजे ॥

तोहे कर में अस्त्र त्रिशूला ।

जाते उठत शत्रु हिय शूला ॥

नगरकोटि में तुम्हीं विराजत ।

तिहुँ लोक में डंका बाजत ॥

शुंभ निशुंभ दानव तुम मारे ।

रक्तबीज शंखन संहारे ॥

महिषासुर न्रिप अति अभिमानी ।

जेहि अघ भार मही अकुलानी ॥

रूप कराल कालिका धारा ।

सेन सहित तुम तिहि संहारा ॥

पडी भीढ संतन पर जब जब ।

भयि सहाय मातु तुम तब तब ॥

अमरपुरी अरु बासव लोका ।

तब महिमा सब कहें अशोका ॥

ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी ।

तुम्हें सदा पूजें नर नारी ॥

प्रेम भक्ति से जो यश गावेम् ।

दुःख दारिद्र निकट नहिं आवेम् ॥

ध्यावे तुम्हें जो नर मन लायि ।

जन्म मरण ते सौं छुट जायि ॥

जोगी सुर मुनि कहत पुकारी ।

योग न होयि बिन शक्ति तुम्हारी ॥

शंकर आचारज तप कीनो ।

काम अरु क्रोध जीत सब लीनो ॥

निशिदिन ध्यान धरो शंकर को ।

काहु काल नहिं सुमिरो तुमको ॥

शक्ति रूप को मरम न पायो ।

शक्ति गयी तब मन पछतायो ॥

शरणागत हुयि कीर्ति बखानी ।

जय जय जय जगदंब भवानी ॥

भयि प्रसन्न आदि जगदंबा ।

दयि शक्ति नहिं कीन विलंबा ॥

मोको मातु कष्ट अति घेरो ।

तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो ॥

आशा त्रिष्णा निपट सतावेम् ।

रिपु मूरख मॊहि अति दर पावैम् ॥

शत्रु नाश कीजै महारानी ।

सुमिरौं इकचित तुम्हें भवानी ॥

करो क्रिपा हे मातु दयाला ।

रिद्धि-सिद्धि दे करहु निहाला ।|

जब लगि जिय

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