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(हो...)
ना ताज की चाहत, ना शोहरत का नशा
अपनी मिट्टी से बढ़कर ना कुछ यहाँ
माथे पे तिलक, दिल में भगवान
प्रयागराज की धरती, अपनी पहचान
पूर्वांचल की माटी, लहजे में धार
बातों में वजन, दिल में संस्कार
ना झुकता उसूलों से, ना बिकता ज़मीर
अपनी ही धुन में, अपनी तक़दीर
महफिल में बैठे तो रंग बदल जाए
ढोल की थाप पे समाँ सँवर जाए
ना ऊँची आवाज़ से रुतबा दिखाएँ
अपने व्यवहार से पहचान बनाएँ
ई मिज़ाज हा अपना, ई पहचान हा
माटी से जुड़ल दिल, ऊँचा अरमान हा
मिज़ाज नवाबी, अंदाज़ दबंग
अपनी ही धुन, अपना ही रंग!
प्रयागराज की धरती, संगम का नूर
अपने इरादों में पक्का, अपने उसूलों में मजबूत!
ना झूठा दिखावा, ना खोखली शान
इज्जत से बनती है असली पहचान!
जब ढोल बजे और नगाड़ा पुकारे
पूरा समाँ अपने रंग में उतारे!
(मिज़ाज नवाबी...)
रौहा की गलियों से उठती बहार
कछना की माटी से जुड़ा है प्यार
अपनों का मान और बड़ों का सम्मान
यही तो बनाता है इंसान महान
मुश्किल हो सामने, हौसला जवान
मेहनत से लिखता है अपनी पहचान
जो साथ खड़े हों, उनका मान रहे
हर दिल में इंसानियत की जगह रहे
मिज़ाज नवाबी, अंदाज़ दबंग
अपनी ही धुन, अपना ही रंग!
प्रयागराज की धरती, संगम का नूर
अपने इरादों में पक्का, अपने उसूलों में मजबूत!
ना झूठा दिखावा, ना खोखली शान
इज्जत से बनती है असली पहचान!
जब ढोल बजे और नगाड़ा पुकारे
पूरा समाँ अपने रंग में उतारे!
(अपना ही रंग...)
सिर पर बजरंगी का आशीष रहे
माता के चरणों में विश्वास रहे
गंगा-यमुना के संगम की धार
प्रभु की क्रिपा से महके संसार
(जय श्री राम...)
मिज़ाज नवाबी, अंदाज़ दबंग
अपनी ही धुन, अपना ही रंग!
ना झूठा दि