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जय अनादि श्रीक्रिष्णनारायण
श्रीक्रिष्णवल्लभाचार्यजी महाराज की दिव्य जीवनगाथा
[Intro]
एक नाम… जो युगों तक गूँजे,
एक ज्योत… जो कभी न बुझे।
एक दिव्य जीवन, एक महान विचार,
भक्तों के ह्रिदय में प्रभु का दरबार।
कुमकुमवापी की पावन धरती,
जहाँ प्रकटे प्रभु महान।
जय अनादि श्रीक्रिष्णनारायण,
जय प्रगट भगवान!
[Chorus]
जय अनादि श्रीक्रिष्णनारायण,
जय प्रगट प्रभु भगवान!
जय श्रीक्रिष्णवल्लभाचार्यजी,
आपको कोटि-कोटि प्रणाम!
गूँजे धरती, गूँजे अंबर,
गूँजे आपका नाम।
भक्ति, ग्यान और शरणागति को,
समर्पित चारों धाम!
[Verse 1]
इक्कीस अक्टूबर उन्नीस सौ पाँच,
पावन दिन वह आया।
कुमकुमवापी की पुण्य धरा पर,
दिव्य प्रकाश छाया।
माता कमलक्ष्मी धन्य हुईं,
धन्य हुए गोपालक्रिष्ण।
बालरूप में दिव्य तेज था,
ह्रिदय में विराजे क्रिष्ण।
बचपन से ही प्रभु-भक्ति का,
अंतर में था वास।
जीवन का हर पल कहता था,
हरि ही परम प्रकाश।
[Verse 2]
मोह-माया के बंधन त्यागे,
धर्म-पथ अपनाया।
जेतपुर की पावन धरती पर,
दीक्षा का दिन आया।
श्रीक्रिष्णवल्लभाचार्य नाम से,
जग में हुआ विख्यात।
हरि-भक्ति और धर्म-प्रचार को,
कर दिया जीवन दान।
निज सुख की कोई चाह न रखी,
सेवा बनी पहचान।
जीवों को प्रभु-पथ दिखलाना,
यही रहा अरमान।
[Verse 3]
काशी की पावन भूमि में,
ग्यान-साधना की धार।
अठारह वर्षों तक अर्जित किया,
शास्त्रों का भंडार।
वेद-पुराणों के मर्म समझकर,
ग्यान का दीप जलाया।
भक्ति, धर्म और शरणागति का,
सच्चा अर्थ बताया।
वाणी में अम्रित, ह्रिदय में करुणा,
दिव्य विचार महान।
ग्यान-ज्योति से आलोकित हुआ,
असंख्य भक्तों का प्राण।
[Chorus]
जय अनादि श्रीक्रिष्णनारायण,
जय प्रगट प्रभु भगवान!
जय श्रीक्रिष्णवल्लभाचार्यजी,
आपको कोटि-कोटि प्रणाम!
[Verse 4]
गाँव-गाँव में धर्म जगाया,
हरि-महिमा समझाई।
भटके मन को राह दिखाकर,
भक्ति की ज्योत जलाई।
दीन-दुखी के मन में आशा,
भक्तों के मन विश्वास।
प्रभु के चरणों में जीवन अर्पित,
यही दिया उपदेश।
सेवा, साधना, प्रेम और श्रद्धा,
जीवन के आधार।
आपकी दिव्य प्रेरणा से,
जागा भक्ति-विचार।
[Verse 5]
कलम चली तो ग्यान बरसने लगा,
शब्द बने वरदान।
सत्तावन शास्त्रों की रचना से,
धन्य हुआ धर्म-ग्यान।
लक्ष्मीनारायण संहिता में,
दिव्य ग्यान की धारा।
भक्ति और शरणागति का,
मिला जगत को सहारा।
ग्रंथों में अम्रित, वचनों में शक्ति,
साधना का सम्मान।
युग-युग तक प्रकाश फैलाएँ,
आपके दिव्य विधान।
[Verse 6]
जूनागढ़ कर्मभूमि बनी,
धर्म-प्रचार का धाम।
जामवन्तली की पावन धरती,
गूँजा प्रभु का नाम।
जामनगर सहित अनेक स्थलों पर,
सेवा की ज्योत जलाई।
सत्संग और हरि-भक्ति से,
जन-जन में चेतना जगाई।
आपका जीवन बना उदाहरण,
आपका संदेश महान।
भक्ति-पथ पर चलने वालों का,