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Lyrics
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दुर्गम काज जगत के जेते। सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥ २० ॥
राम दुआरे तुम रखवारे। होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥ २१ ॥
सब सुख लहै तुम्हारी सरना। तुम रच्छक काहू को डर ना॥ २२ ॥
आपन तेज सम्हारो आपै। तीनों लोक हाँक तें कापै॥ २३ ॥
भूत पिसाच निकट नहिं आवै। महाबीर जब नाम सुनावै॥ २४ ॥
नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा॥ २५ ॥
संकट तें हनुमान छुड़ावै। मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥ २६ ॥
सब पर राम तपस्वी राजा। तिन के काज सकल तुम साजा॥ २७ ॥
और मनोरथ जो कोई लावै। सोई अमित जीवन फल पावै॥ २८ ॥
चारों जुग परताप तुम्हारा। है परसिद्ध जगत उजियारा॥ २९ ॥
साधु-संत के तुम रखवारे। असुर निकंदन राम दुलारे॥ ३० ॥
अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता। अस बर दीन जानकी माता॥ ३१ ॥
राम रसायन तुम्हरे पासा। सदा रहो रघुपति के दासा॥ ३२ ॥
तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम-जनम के दुख बिसरावै॥ ३३ ॥
अंतकाल रघुबर पुर जाई। जहाँ जन्म हरि-भक्त कहाई॥ ३४ ॥
और देवता चित्त न धरई। हनुमत सेइ सर्ब सुख करई॥ ३५ ॥
संकट कटै मिटै सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥ ३६ ॥
जै जै जै हनुमान गोसाईं। कृपा करहु गुरुदेव की नाईं॥ ३७ ॥
जो सत बार पाठ कर कोई। छूटहि बंदि महा सुख होई॥ ३८ ॥
जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा। होय सिधि साखी गौरीसा॥ ३९ ॥
तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय महँ डेरा॥ ४० ॥
॥ दोहा ॥
पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥