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Divya Sharanam Prabhu
Devotional

Divya Sharanam Prabhu

Rajinder KumarRajinder Kumar
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Style: Soulful vocals, duet, दिव्य, शांत, श्रद्धापूर्ण → शक्तिशाली → भावपूर्ण समर्पण
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Lyrics

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श्री दुर्गा चालीसा

Style-Genre: Traditional Maa Durga Bhajan / Devi Chalisa

Vocal Arrangement

Male Voice: गहरी, गंभीर, ओजस्वी और स्पष्ट।

Female Voice: मधुर, भावपूर्ण, भक्तिमय।

दोनों आवाज़ें लगातार साथ न गाएँ; Male → Female → Both call-and-response रखें।

मुख्य शब्दों पर dynamic accent:

“दुर्गे”, “अम्बे”, “माँ”, “भवानी”, “शक्ति”, “कालिका”, “महिषासुर”, “जय जगदम्ब”, “शरण”

“जय जय जय जगदम्ब भवानी” पर दोनों स्वर ऊँची आवाज़ में।

हर चौपाई के बीच लगभग शून्य.पांच–एक सेकंड का छोटा devotional pause।

बहुत तेज़ pronunciation न हो।

शब्द स्पष्ट रहें और चालीसा का पाठ समझ में आए।

Instruments

तानपुरा + हारमोनियम + बाँसुरी + संतूर + तबला + ढोलक + मंजीरा + करताल/खड़ताल + मंदिर घंटियाँ + घुँघरू + शंख + soft devotional strings/pad

श्री दुर्गा चालीसा

नमो नमो दुर्गे सुख करनी ।

नमो नमो अंबे दुःख हरनी ॥ एक ॥

निरंकार है ज्योति तुम्हारी ।

तिहू लोक फैली उजियारी ॥ दो ॥

शशि ललाट मुख महाविशाला ।

नेत्र लाल भ्रिकुटि विकराला ॥ तीन ॥

रूप मातु को अधिक सुहावे ।

दरश करत जन अति सुख पावे ॥ चार ॥

तुम संसार शक्ति लय कीना ।

पालन हेतु अन्न धन दीना ॥ पांच ॥

अन्नपूर्णा हुयि जग पाला ।

तुम ही आदि सुंदरी बाला ॥ छह ॥

प्रलयकाल सब नाशन हारी ।

तुम गौरी शिव शंकर प्यारी ॥ सात ॥

शिव योगी तुम्हरे गुण गावेम् ।

ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावेम् ॥ आठ ॥

रूप सरस्वती का तुम धारा ।

दे सुबुद्धि रिषि मुनिन उबारा ॥ नौ ॥

धरा रूप नरसिंह को अंबा ।

परगट भयि फाड के खंबा ॥ दस ॥

रक्षा कर प्रह्लाद बचायो ।

हिरण्याक्ष को स्वर्ग पठायो ॥ ग्यारह ॥

लक्ष्मी रूप धरो जग माहीम् ।

श्री नारायण अंग समाहीम् ॥ बारह ॥

क्षीरसिंधु में करत विलासा ।

दयासिंधु दीजै मन आसा ॥ तेरह ॥

हिंगलाज में तुम्हीं भवानी ।

महिमा अमित न जात बखानी ॥ चौदह ॥

मातंगी धूमावति माता ।

भुवनेश्वरी बगला सुखदाता ॥ पंद्रह ॥

श्री भैरव तारा जग तारिणी ।

छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी ॥ सोलह ॥

केहरि वाहन सोह भवानी ।

लांगुर वीर चलत अगवानी ॥ सत्रह ॥

कर में खप्पर खडग विराजे ।

जाको देख काल डर भाजे ॥ अठारह ॥

तोहे कर में अस्त्र त्रिशूला ।

जाते उठत शत्रु हिय शूला ॥ उन्नीस ॥

नगरकोटि में तुम्हीं विराजत ।

तिहुँ लोक में डंका बाजत ॥ बीस ॥

शुंभ निशुंभ दानव तुम मारे ।

रक्तबीज शंखन संहारे ॥ इक्कीस ॥

महिषासुर न्रिप अति अभिमानी ।

जेहि अघ भार मही अकुलानी ॥ बाईस ॥

रूप कराल कालिका धारा ।

सेन सहित तुम तिहि संहारा ॥ तेईस ॥

पडी भीढ संतन पर जब जब ।

भयि सहाय मातु तुम तब तब ॥ चौबीस ॥

अमरपुरी अरु बासव लोका ।

तब महिमा सब कहें अशोका ॥ पच्चीस ॥

ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी ।

तुम्हें सदा पूजें नर नारी ॥ छब्बीस ॥

प्रेम भक्ति से जो यश गावे�

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