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Rough Hands Soft Heart
Male Vocalist

Rough Hands Soft Heart

M
MILIND NIMESH
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Style: male vocal
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Lyrics

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एक सवाल है…

जब शहर में आग लगती है,

तो राख जनता के घरों की क्यों होती है?

जब नफ़रत का बाज़ार सजता है,

तो मुनाफ़ा किसी और की झोली में क्यों होता है?

सोचो ज़रा…

आग यहाँ, धुआँ यहाँ,

किसका जलता आशियाना है?

लड़ता कौन, मरता कौन,

किसका चमकता ख़ज़ाना है?

जनता सड़क पे लड़ती है,

नेता मंच से बोलता है,

कौन है जो नफ़रत बेचकर,

अपनी दुकान खोलता है?

हाथ में किताब उठाओ,

झूठ के पर्दे हटाओ,

धर्म नहीं है दोषी यहाँ,

स्वार्थ का चेहरा पहचानो!

किसी ने नारा उछाला,

किसी ने रंग चढ़ाया,

किसी ने धर्म का नाम लिया,

किसी ने जोश बढ़ाया।

भीड़ चली तो भीड़ के आगे,

किसने राह दिखाई?

घर में माँ की चीखें गूँजीं,

किसने ख़बर लगाई?

जिसके बच्चे अनाथ हुए,

उसका कौन सहारा?

जिसकी रोज़ी जलकर राख हुई,

उसका कौन हमारा?

मंचों पर भाषण जारी थे,

कैमरों की भरमार,

आम आदमी ढूँढ़ रहा था,

अपना घर-परिवार।

आग यहाँ, धुआँ यहाँ,

किसका जलता आशियाना है?

लड़ता कौन, मरता कौन,

किसका चमकता ख़ज़ाना है?

हाथ में किताब उठाओ,

झूठ के पर्दे हटाओ,

धर्म नहीं है दोषी यहाँ,

स्वार्थ का चेहरा पहचानो!

तुमसे कहा—ये तुम्हारी लड़ाई,

तुमने अपनी जान गँवाई,

जिसने तुमको आगे कर दिया,

उसकी बारी कब आई?

तुमने अपना भाई खोया,

उसने वोटों की गिनती की,

तुमने अपनों की अर्थी ढोई,

उसने सत्ता की बातें कीं।

कब तक कोई भावनाओं से,

अपनी कुर्सी सजाएगा?

कब तक भोली जनता का

जुनून खरीदा जाएगा?

नेता से भी सवाल करो,

अपने मन से भी सवाल करो,

नारे से पहले सच को परखो,

फिर अपना हर ख़याल करो!

मंदिर की घंटी हो या

मस्जिद की अज़ान,

गुरुद्वारे की वाणी हो या

बुद्ध का शांति-पथ महान।

सबकी आस्था का सम्मान,

सबको जीने का अधिकार,

लेकिन नफ़रत की राजनीति से

बचाना है अपना संसार।

धर्म अगर इंसानियत सिखाए,

तो उसको दिल में रखना,

लेकिन जो विवेक छीन ले,

उससे सवाल भी करना।

नफ़रत की आग बुझाओ!

शिक्षा की मशाल जलाओ!

किताबों से ताक़त पाओ!

अपने विवेक को जगाओ!

न कोई घर फिर राख बने,

न कोई बच्चा लाचार रहे,

न मज़हब के नाम पर बैर रहे,

न इंसानियत शर्मसार रहे!

अब जनता केवल भीड़ नहीं,

अब जनता जागेगी,

झूठ के हर बाज़ार में

सच की आवाज़ उठेगी!

याद रखना…

आस्था तुम्हारी अपनी है,

लेकिन तुम्हारी नफ़रत का फ़ायदा

कौन उठा रहा है—

यह सवाल भी तुम्हारा अपना है।

हाथ में किताब रखो…

दिल में इंसानियत रखो…

और दिमाग़ में सवाल रखो।

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