
Dwapar Ka Mahagatha
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Lyrics
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[Intro]
त्रेता ढल गया...
धर्म अब दो चरणों पर है...
अधर्म बढ़ने लगा...
तब आया द्वापर...
जहाँ भगवान ने लीला रची...
[Chorus]
जब-जब धर्म की हानि होती है...
तब-तब प्रभु अवतार लेते हैं...
क्रिष्ण कन्हैया, मुरली बजैया...
धर्म की रक्षा करने आए...
हरे क्रिष्ण... हरे क्रिष्ण...
[Verse 1]
मथुरा में कंस का अत्याचार...
देवकी-वासुदेव कारागार...
भादों की रात, घनघोर बरसात...
जन्मे क्रिष्ण, खुले सब द्वार...
यमुना ने दिया रास्ता...
गोकुल पहुँचे नंदद्वार...
[Verse 2]
माखन चुराया, मटकी फोड़ी...
यशोदा ने बाँधा, प्रेम की डोरी...
पूतना आई, विष पिलाने...
प्राण गए उसके, क्रिष्ण मुस्काने...
कालिया नाग पर किया न्रित्य...
यमुना हुई निर्मल, पावन...
[Verse 3]
इंद्र का घमंड चूर किया...
उँगली पर पर्वत उठाया...
गोकुल ने पाई शरण...
बाँसुरी की धुन, राधा का प्रेम...
रास रचा व्रिंदावन में...
भक्ति का रंग छाया...
[Chorus]
जब-जब धर्म की हानि होती है...
तब-तब प्रभु अवतार लेते हैं...
क्रिष्ण कन्हैया, मुरली बजैया...
हरे क्रिष्ण... हरे क्रिष्ण...
[Verse 4]
मथुरा आए, कंस मारा...
माता-पिता को मुक्त किया...
सुदामा आया, फटे हाल में...
मित्र को राजा बना दिया...
समुद्र किनारे द्वारका बसी...
सोने की नगरी, धर्म की राजधानी...
[Verse 5]
हस्तिनापुर में बढ़ा घमंड...
दुर्योधन की ईर्ष्या, शकुनि की चाल...
जुए में हारे पाँचों पांडव...
भरी सभा में द्रौपदी का हाल...
चीर बढ़ाया क्रिष्ण ने...
लाज बचाई, धर्म पुकारा...
[Verse 6]
बारह वर्ष वन, एक वर्ष अग्यात...
लौटे पांडव, माँगा अपना हक़...
क्रिष्ण गए शांति-दूत बनकर...
दुर्योधन बोला, सुई भर भी नहीं...
तब तय हुआ, होगा महायुद्ध...
[Verse 7]
कुरुक्षेत्र में खड़ा अर्जुन...
काँपते हाथ, गिरा गांडीव...
क्रिष्ण बोले, उठ पार्थ...
कर्म कर, फल की चिंता छोड़...
आत्मा अमर है, देह नश्वर...
यही गीता, यही सार...
[Verse 8]
अट्ठारह दिन का महासंग्राम...
भीष्म गिरे बाणों की शय्या पर...
अभिमन्यु चक्रव्यूह में वीर...
द्रोण गिरे, कर्ण का रथ धँसा...
भीम ने तोड़ी दुर्योधन की जंघा...
अधर्म हारा, धर्म जीता...
[Verse 9]
युधिष्ठिर बने हस्तिनापुर के राजा...
पर जीत में भी था दर्द...
गांधारी का श्राप लगा...
यदुवंश आपस में मिट गया...
प्रभास तट पर बैठे क्रिष्ण...
तीर लगा, लीला समेटी...
द्वारका डूबी सागर में...
[Final Hook]
ये था द्वापर...
कर्म का महायुग...
क्रिष्ण की गीता, धर्म का सार...
सत्य वही, जो धर्म के साथ...
[Outro]
क्रिष्ण चले गए...
पर गीता अमर है...
अब धर्म एक चरण पर खड़ा है...
काल का चक्र आगे बढ़ा...
और आ पहुँचा... कलियुग...