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Midnight Engine Hum
Alternative Rock

Midnight Engine Hum

Yogesh DargarYogesh Dargar
0 likes1 plays5:47
Style: Heavy bass, male vocal, guitar, drums, bass, nostalgic
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सौ योजन का अथाह सागर... सामने लहरों का गर्जन... ..और पीछे श्रीराम के करोड़ों वानरों की निराश आँखें। कोई नहीं जानता था कि इस पार खड़ा एक वानर, उस पार बसी सोने की लंका तक पहुँच पाएगा या नहीं। तभी जामवंत ने उसे उसकी भूली हुई शक्ति याद दिलाई। पवनपुत्र का शरीर बढ़ने लगा... पर्वत काँप उठे... और श्रीराम का नाम लेकर वह आकाश की ओर उछल पड़ा। रास्ते में आईं राक्षसी सिंहिका, देवताओं की भेजी परीक्षा सुरसा, और आगे थी रावण की अजेय लंका। पर जिसके हृदय में स्वयं श्रीराम बसते हों, उसे कौन रोक सकता है? यह कथा है उस भक्त की, जिसने अपने बल से लंका जलाई, और अपनी भक्ति से श्रीराम का हृदय जीत लिया। यह है श्री सुंदरकांड... हनुमान जी की भक्ति और महिमा की अमर गाथा। जय श्री राम!

आकाश में एक तेज़ रेखा खिंच गई थी। नीचे सागर गरज रहा था, और ऊपर पवनपुत्र बाण की तरह बढ़े जा रहे थे। तभी सागर की गहराई से सुनहरा मैनाक पर्वत ऊपर उठा। वह बोला, "हे वायुपुत्र, तुम्हारे पिता ने कभी मेरी रक्षा की थी। थोड़ा विश्राम कर लो, फिर आगे बढ़ना।" हनुमान जी ने पर्वत को प्रेम से छुआ और कहा, "मित्र, तुम्हारा स्नेह स्वीकार है। पर जब तक श्रीराम का कार्य पूरा न हो, मेरे लिए विश्राम कहाँ?" फिर देवताओं ने उनकी परीक्षा लेने के लिए नागमाता सुरसा को भेजा। उसने विशाल मुख फैलाकर कहा, "आज तू मेरा भोजन बनेगा।" हनुमान जी ने हाथ जोड़े, "माता, मैं श्रीराम के कार्य से जा रहा हूँ। लौटकर स्वयं आपके मुख में आ जाऊँगा।" पर सुरसा नहीं मानी। उसका मुख बढ़ता गया, और हनुमान जी भी बढ़ते गए। फिर अचानक वे अँगूठे जितने छोटे हुए, मुख में गए और पल भर में बाहर निकल आए। सुरसा मुस्कुरा उठी, "पुत्र, मैं तेरी बुद्धि और बल की परीक्षा लेने आई थी। जा, तेरा कार्य सिद्ध हो।" आगे सिंहिका नाम की राक्षसी जल में छिपी थी। वह परछाईं पकड़कर उड़ते प्राणियों को खींच लेती थी। उसने हनुमान जी को भी नीचे खींचना चाहा। पर पवनपुत्र उसके मुख में घुसे और भीतर से उसका अंत कर दिया। अब सामने था त्रिकूट पर्वत, और उसके शिखर पर सोने की लंका। सूरज ढल चुका था। ऊँचे परकोटे, स्वर्ण-महल और हर द्वार पर राक्षसों के पहरे थे। इतनी बड़ी लंका में एक वानर का प्रवेश असंभव लगता था। हनुमान जी ने विचार किया, "विशाल रूप में जाऊँगा तो पकड़ा जाऊँगा।" उन्होंने बिल्ली जितना छोटा रूप धारण किया और रात के अँधेरे में नगर-द्वार की ओर बढ़े। तभी द्वार पर लंका की रक्षक देवी लंकिनी प्रकट हुई, "रुक जा! कौन है तू चोर?"

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