
Nirgun Ki Alakh Jagayi
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Lyrics
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ए मनवा, काहे भटकेला रे, झूठी माया में काहे अटकेला रे। चार दिन के मेला ई दुनिया, फेर अकेले जाए के पड़ेला रे॥
राम नाम के जोत जरा ले, भीतर के अँधियार मिटा ले। माटी के ई देहिया मनवा, माटी में मिल जाए के रे॥
ऊँच-नीच के भेद बनवले, जात-पात के जाल। एके माटी, एके पानी, एके सबके हाल॥
कोई महल में नींद न पावे, कोई छप्पर में सोए। काल के आगे राजा-रंकवा, एके राहे रोए॥
ए मनवा, काहे भटकेला रे, झूठी माया में काहे अटकेला रे॥
मंदिर-मस्जिद घूमत बीतल, मन के खबर न पाइल। अपने भीतर झाँक न पवलs, बाहर दीप जराइल॥
कंकर-पत्थर पूजत-पुजत, बीते उमिरिया सारी। प्रेम के बोली बोल ए मनवा, ईहे पूजा सच्ची हमारी॥
धन-दौलत आ महल-अटारी, सबहीं इहवाँ रह जाई। साँस के डोरी टूटते ही, कोई साथ न जाई॥
जवन कमइला प्रेम के दौलत, ओकर नाम अमर होई। दुखिया के जे दुख हर लेई, ओकर जीवन सफल होई॥
काया नगर में पाँच लुटेरा, मनवा के भरमावे। काम, क्रोध आ लोभ, मोहवा, दिन-रात नाच नचावे॥
गुरु के ज्ञान के दीप जरा के, मन के द्वार खोल। झूठ-कपट के गठरी छोड़ के, सत के अमृत घोल॥
ना हम राजा, ना हम रंकवा, ना हम देह, ना नाम। भीतर जेकर जोत जरत बा, ओही निराकार के धाम॥
ए मनवा, अब चेत जा रे, समय के मोल पहिचान। साँस-साँस में नाम सम्हारs, सतगुरु के करs ध्यान॥
ए मनवा, काहे भटकेला रे… झूठी माया में काहे अटकेला रे…॥