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(मुखड़ा / Chorus)
पाञ्चजन्य शंख गूंजे, कांपे सकल संसार रे।
अधर्म का जो ध्वंस करे, क्रिष्ण का अवतार रे॥
नैनों में ब्रह्मांड समाया, रूप महा विकराल है।
काल का भी काल बने वो, क्रिष्ण स्वयं महाकाल है॥
पाञ्चजन्य शंख गूंजे, कांपे सकल संसार रे।
अधर्म का जो ध्वंस करे, क्रिष्ण का अवतार रे॥
[Verse 1]
मुख खोला जब यशोमती आगे, चौदह भुवन दिखाए थे।
सूर्य, चंद्र और तारागण सब, भीतर ही चमकाए थे॥
कंस-केशी के घमंड को, जिसने पल में चूर किया।
भक्तों के हर संकट को, अपने तेज से दूर किया॥
जिनके चरणों में झुके अंबर, जिनका अतुलित मान है।
योगीश्वर उस क्रिष्ण की महिमा, सबसे परम महान है॥
[Chorus]
पाञ्चजन्य शंख गूंजे, कांपे सकल संसार रे।
अधर्म का जो ध्वंस करे, क्रिष्ण का अवतार रे॥
[Verse 2]
रणभूमि में पार्थ का रथ जो, आगे हांकते जाते हैं।
गीत ग्यान का गाकर जग को, जीवन राह दिखाते हैं॥
उठा चक्र जब हाथ में उनके, थर-थर धरती डोल उठी।
दिशा-दिशा में गगन-गगन में, विजय पताका बोल उठी॥
अस्त्र बिना ही शत्रु दल को, जिसने पल में मात दिया।
सत्य और उस धर्म का जग में, सदा-सदा ही साथ दिया॥
[Chorus]
पाञ्चजन्य शंख गूंजे, कांपे सकल संसार रे।
अधर्म का जो ध्वंस करे, क्रिष्ण का अवतार रे॥
[Verse 3]
ना कोई भय, ना कोई संशय, जिसके मन में श्याम बसे।
उसके जीवन की बगिया में, तेज-प्रताप का फूल खिले॥
माया जिनकी दासी बनती, समय झुकाता शीश जहाँ।
क्रिष्ण नाम की शक्ति जागे, टिक सकता फिर कष्ट कहाँ॥
अखंड तेज, अनंत सामर्थ्य, योगिराज कहलाते हैं।
द्वारकाधीश क्रिपा कर अपनी, भक्तों को अभय बनाते हैं॥
(समापन / Outro Chant - तीव्र लय में)
जय जय योगीश्वर क्रिष्ण हरे!
जय जय पाण्डव रक्षक क्रिष्ण हरे!
चक्र सुदर्शन धारी जय!
कुरुक्षेत्र अवतारी जय!
बोलो जय श्री क्रिष्ण! जय द्वारकाधीश!
बोलो जय श्री क्रिष्ण! जय द्वारकाधीश!