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Morning Raga Awakening
Indian Classical

Morning Raga Awakening

Ram Kumar SinghaRam Kumar Singha
0 likes0 plays2:37
Style: indian classical, sitar, tabla, tanpura, raaga, meditative, traditional, male vocal, uplifting, peaceful
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Lyrics

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[Intro]

बड़ा जतन कर मंदिर बाँधा, अपने मन के गाँव,

खुद ही मूरत, खुद ही पुजारी, खुद ही अपना नाँव।

पत्थर-पत्थर जोड़ रहा था, समझा यही मकान,

भीतर बैठा 'मैं' मुस्काए, बाहर खोजूँ राम।

दीया जलाया सौ-सौ बार, मन का तम न गया,

भला हुआ इक दिन ऐसा आया…

मन का मंदिर ढह गया…

[Verse 1]

ऊँची-ऊँची दीवारें थीं, जिनका नाम था ग्यान,

हर दीवार के पीछे बैठा, मेरा ही अभिमान।

शास्त्र पढ़े और शब्द सँवारे, बाँटी सबको सीख,

अपने भीतर झाँक न पाया, कैसी मेरी दीख।

हाथ उठाकर माँगूँ मुक्ति, मन माँगे संसार,

होंठों पर वैराग्य सजाया, भीतर इच्छाएँ हज़ार।

बाहर बैठा साधु बनकर, भीतर बैठा चोर,

राम-राम की धुन में भी मैं, खोजूँ अपना शोर।

[Chorus]

मन का मंदिर ढह गया रे, टूटी झूठी शान,

जिसको अपना घर समझा था, निकला वो अभिमान।

गिरने दे रे, गिरने दे, ये दीवारें आज,

इनके पीछे छुपा हुआ है, तेरा सच्चा राज।

ना मैं जोगी, ना मैं ग्यानी, ना कोई पहचान,

'मैं' की राख बिखर गई तो, दिखने लगे भगवान।

मन का मंदिर ढह गया रे…

भला हुआ… मन का मंदिर ढह गया।

[Verse 2]

चरणों में सौ फूल चढ़ाए, काँटे मन में बोए,

जग के आगे खूब हँसा मैं, भीतर बैठा रोए।

गंगा जाकर तन को धोया, मैल न मन का छूटा,

दुनिया भर से रिश्ता जोड़ा, खुद से नाता टूटा।

किसके आगे दीप जलाऊँ, किसको दूँ मैं दान?

जब तक दूजे में न दिखे तू, कैसा तेरा ध्यान?

ऊँचे स्वर में भजन सुनाया, सुन ले सारा गाँव,

मौन हुआ तो पहली बार मैं, सुन पाया तेरा नाँव।

पंडित बोला, पूजा कर ले, मन बोला कुछ और,

जिसको ढूँढे मंदिर-मंदिर, बैठा तेरी ठौर।

[SPOKEN – संगीत धीमा | केवल एकतारा]

अरे ओ मनवा…

तूने बड़ा सुंदर मंदिर बनाया था।

सोने का कलश… चाँदी की घंटी…

चंदन की खुशबू… और रेशम के पर्दे।

लेकिन बता…

उस मंदिर में राम रहते थे?

या तेरी अपनी तस्वीर?

तूने कितनों को अपवित्र कहा…

कितनों को अपने से छोटा समझा…

और फिर उसी ज़ुबान से राम का नाम लिया।

अरे बावरे…

राम तेरे मंदिर से रूठे नहीं थे…

तूने ही अपने 'मैं' को इतना बड़ा कर लिया,

कि राम के बैठने की जगह ही न बची।

आज दीवार गिर गई है…

रो मत।

अब भीतर हवा आएगी।

अब भीतर उजाला होगा।

अब शायद…

राम को दरवाज़ा खटखटाना नहीं पड़ेगा।

[Verse 3]

एक ईंट थी लोभ की मेरी, दूजी थी अभिमान,

तीजी ईंट अपेक्षा निकली, चौथी झूठी शान।

गिरती गईं वो एक-एक करके, उड़ने लगी थी धूल,

धूल हटी तो देख लिया रे, कैसी मेरी भूल।

जिसको पाना चाह रहा था, वो कब मुझसे दूर?

मैं ही अपने शोर में डूबा, वो था मौन भरपूर।

ना आसन की अब अभिलाषा, ना कोई उपवास,

राम मिले ना सौदों से रे, राम मिले

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