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Silk into Steel
Classical

Silk into Steel

mehul patelmehul patel
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Style: classical, orchestral, strings, piano, 60 bpm, elegant, emotive, timeless, female vocal, aggressive
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Lyrics

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शिव ताण्डव स्तोत्रम् — रावणक्रितम्

[Verse 1]

जटा टवी गलज्जल प्रवाह पावित स्थले

गलेवलम्ब्य लम्बितां भुजंग तुंग मालिकाम्।

डमड् डमड् डमड् डमन्निनाद वड् डमर्वयं

चकार चण्ड ताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम्॥

[Verse 2]

जटा कटाह संभ्रम भ्रमन्निलिम्प निर्झरी

विलोले वीचि वल्लरी विराजमान मूर्धनि।

धगद् धगद् धगज्ज्वल ललाट पट्ट पावके

किशोर चन्द्र शेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम॥

[Verse 3]

धरा धरेन्द्र नन्दिनी विलास बन्धु बन्धुर

स्फुरद् दिगन्त संतति प्रमोद मान मानसे।

क्रिपा कटाक्ष धोरणी निरुद्ध दुर्धरापदि

क्वचिद् दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि॥

[Verse 4]

जटा भुजंग पिंगल स्फुरत् फणा मणि प्रभा

कदम्ब कुंकुम द्रव प्रलिप्त दिग्वधू मुखे।

मदान्ध सिंधुर स्फुरत् त्वगुत्तरीय मेदुरे

मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूत भर्तरि॥

[Verse 5]

सहस्र लोचन प्रभ्रित्य शेष लेख शेखर

प्रसून धूलि धोरिणी विधूसरांघ्रि पीठभूः।

भुजंग राज मालया निबद्ध जाट जूटकः

श्रियै चिराय जायतां चकोर बन्धु शेखरः॥

[Verse 6]

ललाट चत्वर ज्वलद् धनंजय स्फुलिंग भा

निपीत पंच सायकं नमन्निलिम्प नायकम्।

सुधा मयूख लेखया विराजमान शेखरं

महाकपाली सम्पदे शिरो जटालमस्तु नः॥

[Verse 7]

कराल भाल पट्टिका धगद् धगद् धगज्ज्वल

द्धनंजयाहुती क्रित प्रचण्ड पंच सायके।

धरा धरेन्द्र नन्दिनी कुचाग्र चित्र पत्रक

प्रकल्पनैक शिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम॥

[Verse 8]

नवीन मेघ मंडली निरुद्ध दुर्धर स्फुरत्

कुहू निशीथिनी तमः प्रबन्ध बद्ध कन्धरः।

निलिम्प निर्झरी धरस्तनोतु क्रित्ति सिंधुरः

कला निधान बन्धुरः श्रियं जगद्धुरन्धरः॥

[Verse 9]

प्रफुल्ल नील पंकज प्रपंच कालिम प्रभा

वलम्बि कण्ठ कन्दली रुचि प्रबद्ध कन्धरम्।

स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं

गजच्छिदान्धकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे॥

[Verse 10]

अखर्व सर्व मंगल कला कदम्ब मंजरी

रस प्रवाह माधुरी विज्रिम्भणा मधुव्रतम्।

स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं

गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे॥

[Verse 11]

जयत्वदभ्र विभ्रम भ्रमद् भुजंगम श्वस

द्विनिर्गमत् क्रमस्फुरत् कराल भाल हव्यवाट्।

धिमिद्धिमिद्धिमिद्ध्वनन् म्रिदंग तुंग मंगल

ध्वनि क्रम प्रवर्तित प्रचण्ड ताण्डवः शिवः॥

[Verse 12]

द्रिषद् विचित्र तल्पयोः भुजंग मौक्तिक स्रजोर्

गरिष्ठ रत्न लोष्ठयोः सुह्रिद् विपक्ष पक्षयोः।

त्रिणारविन्द चक्षुषोः प्रजा मही महेन्द्रयोः

सम प्रव्रित्तिकः कदा सदाशिवं भजाम्यहम्॥

[Verse 13]

कदा निलिम्प निर्झरी निकुंज कोटरे वसन्

विमुक्त दुर्मतिः सदा शिरःस्थ मंजलिं वहन्।

विलोल लोल लोचनो ललाम भाल लग्नकः

शिवेति मन्त्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम्॥

[Verse 14]

निलिम्प नाथ नागरी कदम्ब मौल मल्लिका

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