
Safar Ki Roshni
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Lyrics
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[INTRO]
शहर की भीड़ में, एक सवाल खड़ा है,
किसपे भरोसा करें, ये सवाल बड़ा है।
किसी की चीख को दुनिया ने सुना नहीं,
पर हर मर्द को गुनाहगार कहना भी सही नहीं।
[VERSE 1]
हाँ, डर है तो डर को खत्म करना होगा,
हर बेटी को बिना डरे घर से निकलना होगा।
जो ज़ुल्म करे, उसको कानून जवाब दे,
जो टूट गई है, उसको इंसाफ़ का ख्वाब दे।
पर एक की गलती का बोझ सब पे क्यों आए?
हर मर्द को देख के सवाल क्यों उठाए?
कुछ हाथ बचाने को आगे भी बढ़ते हैं,
कुछ भाई बहनों के लिए रात भर जागते हैं।
[PRE]
ना नफ़रत चाहिए, ना कोई बदला,
बस इंसाफ़ हो और सच सामने आए।
जो दोषी है उसको सज़ा मिले,
और बे-गुनाह पे इल्ज़ाम ना आए।
[HOOK]
हर मर्द एक जैसा नहीं,
हर चेहरा गुनहगार नहीं,
जो ज़ुल्म करे उसको सज़ा मिले,
पर हर दिल में अंधकार नहीं।
हर बेटी को हक़ है डर से आज़ाद,
हर इंसान को जीने का हक़ है आबाद,
ना औरत कम, ना मर्द महान,
इंसानियत से बनता है इंसान।
[RAP VERSE]
सुन, बात मेरी simple है, समझ ले ज़रा,
Crime करे जो, उसका हो कानूनी फैसला।
ना नाम पे भीड़, ना gender पे blame,
Evidence और justice—यही होना चाहिए game।
मर्द होने का मतलब ताकत दिखाना नहीं,
किसी की मर्ज़ी के बिना उस्से छूना नहीं।
Respect देना weakness नहीं,
किसी की boundary तोड़ना greatness नहीं।
और जो लड़की सड़क पे अकेली चले,
उसकी safety की ज़िम्मेदारी भी system संभाले।
Street light, security, action और law,
सिर्फ़ speeches से नहीं रुकेगा crime का flow।
[BRIDGE]
एक माँ ने बेटा पाला है,
एक बेटी ने सपना संभाला है,
दोनों को इस दुनिया में
बिना डरे जीने का हक़ मिला है।
[FINAL HOOK]
हर मर्द एक जैसा नहीं,
हर चेहरा गुनहगार नहीं,
जो ज़ुल्म करे उसको सज़ा मिले,
पर हर दिल में अंधकार नहीं।
नफ़रत से नहीं, इंसाफ़ से बदलेंगे,
डर से नहीं, आवाज़ से लड़ेंगे।
औरत हो या मर्द—सबकी एक पहचान,
सबसे पहले हम हैं… इंसान।
[OUTRO]
हर मर्द एक जैसा नहीं…
हर औरत अकेली नहीं…
ज़ुल्म के सामने ख़ामोशी नहीं—
और इंसाफ़ से बड़ा कोई जवाब नहीं।