
Jai Veer Hanuman
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[ मुखड़ा]
अंजनी के आँगन में, जन्मे वीर महान,
पवन-पुत्र कहलाए, प्यारे हनुमान।
नटखट थे, बलवान थे, भोले से मुस्कान,
जय-जय बाल हनुमान, जय-जय बाल हनुमान।
जय-जय बाल हनुमान, जय-जय बाल हनुमान,
राम नाम के प्यारे दुलारे, जय बजरंग बलवान।
जय-जय बाल हनुमान, जय-जय बाल हनुमान,
अंजनी माँ के लाल हमारे, जय बजरंग बलवान।
[Verse 1]
कभी पेड़ों पर चढ़ जाते, कभी गगन में जाते,
रिषियों की पूजा में जाकर, फूल उठा ले जाते।
कभी किसी की माला खींचें, कभी कमंडल छुपाएँ,
भोले-भोले मुख पर हँसी, सबको खूब सताएँ।
नटखट बालक ऐसा था, जिससे सब हैरान,
फिर भी सबके मन को भाते, प्यारे हनुमान।
माँ अंजनी जब समझातीं, हँसकर शीश झुकाते,
अगले ही पल फिर शरारत, करने दौड़ लगाते।
[Verse 2]
एक सुबह नभ में चमका, सूरज लाल महान,
बाल हनुमत ने समझा उसको, मीठा लाल फल जान।
देख उसे मन ललचाया, नभ में छलाँग लगाई,
पवन-पुत्र ने उड़ते-उड़ते, सूरज ओर बढ़ाई।
बादल पीछे छूट गए थे, पर्वत रह गए दूर,
बाल हनुमत बढ़ते जाएँ, मन में उमड़ा नूर।
सूरज को फल मान लिया था, भोले बालक जान,
हँसते-हँसते दौड़े आगे, वीर महाबलवान।
[Verse 3]
देवों ने देखा बालक को, सूरज की ओर उड़ते,
इंद्रदेव ने रोका उसको, नभ में आगे बढ़ते।
बाल हनुमत कहाँ रुकने वाले, हँसकर राह बनाए,
तभी इंद्र के वज्र ने आकर, बालक को गिराए।
ठोड़ी पर जब चोट लगी तो, काँपा सारा गगन,
पवनदेव ने क्रोध में रोका, जग का सारा पवन।
देवों को तब चिंता हुई, कैसे बचे जहान,
सबने मिलकर शक्ति दी फिर, बालक हनुमान।
[Verse 4]
पवनदेव ने पुत्र को देखा, घायल पड़ा उदास,
रुक गई संसार की साँसें, छा गया चारों ओर त्रास।
देव सभी तब दौड़े आए, करने लगे पुकार,
“पवनदेव अब शांत हो जाओ, सुन लो हमारी बात।”
ब्रह्मा जी ने हाथ बढ़ाया, बालक को वरदान,
इंद्र ने भी प्रेम से बोला, “अमर रहे तेरा मान।”
देवों ने अपनी-अपनी शक्ति, बालक को दे डाली,
ऐसा वर पाया हनुमत ने, शक्ति हुई मतवाली।
[Verse 5]
अग्नि बोले, “अग्नि न जलाए,” वरुण बोले, “जल न डुबाए,”
वायु बोले, “वेग तुम्हारा, जग में कोई रोक न पाए।”
इंद्र बोले, “वज्र से भी अब, तेरा बाल न बाँका,”
ब्रह्मा बोले, “तेरे ऊपर, संकट आए न ताका।”
देवों ने जब वर बरसाए, खिल उठा आसमान,
बाल हनुमत बन गए तब, अद्भुत शक्तिमान।
नन्हे तन में शक्ति समाई, तेज हुआ महान,
जय-जय देवों के वर पाए, प्यारे हनुमान।
[Verse 6]
शक्ति मिली तो बाल हनुमत, और अधिक इतराए,
कभी पहाड़ को खेल समझकर, ऊपर-नीचे जाएँ।
कभी रिषियों के आश्रम में जाकर, धूम मचाएँ,
कभी तपस्या करते मुनियों को, हँसकर खूब सताएँ।
रिषि-मुनि सब प्रेम करें थे, फिर भी हुए परेशान,
कैसे रोक