
Hum Kaun Hain
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Lyrics
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[Intro]
एक बात पूछूँ?
समाज... क्या है?
लोग कहते हैं—
"समाज ख़राब है।"
लेकिन...
समाज है कौन?
वो?
कोई और?
या...
हम?
[Verse 1]
यहाँ इज़्ज़त भी अजीब चीज़ है,
इंसान देखकर नहीं मिलती।
कपड़े सादे हों तो नज़र बदलती,
महँगे हों तो बात बदलती।
घर छोटा हो तो पूछते हैं—
"कमाता कितना है?"
घर बड़ा हो तो कहते हैं—
"देखो, क्या कमाल किया है।"
एक ही इंसान है...
बस उसकी जेब बदल गई।
कल तक जो "औक़ात" थी,
आज वही "कामयाबी" बन गई।
फिर कहते हैं—
"पैसा सब कुछ नहीं होता।"
अगर सच में ऐसा है...
तो पहली मुलाक़ात में पैसा क्यों पूछा जाता है?
नाम से पहले काम क्यों?
और काम से पहले...
जान-पहचान क्यों?
[Chorus]
ये कैसा समाज है?
ये कैसी रीत है?
सामने बड़ी बातें,
पीछे वही जीत है।
दूसरों के लिए नियम,
अपने लिए रास्ता है।
उँगली सब पर उठती है...
आईना अपने पास है।
[Verse 2]
बेटी से कहते हैं—
"तू आज़ाद है, अपनी ज़िंदगी जी।"
वो बाहर निकले...
तो सवाल शुरू होते हैं।
कहाँ गई?
किसके साथ गई?
इतनी देर क्यों हुई?
कपड़े ऐसे क्यों हैं?
और वही सवाल बेटे से क्यों नहीं?
वो रात में लौटे तो—
"लड़का है... हो जाता है।"
बेटे से कहते हैं—
"मर्द बन, रोना मत।"
फिर उसके कंधों पर
पूरे घर का बोझ रख देते हैं।
उसका डर कमज़ोरी,
उसका आँसू शर्म...
और फिर पूछते हैं—
"आजकल के बच्चे इतने परेशान क्यों हैं?"
[Verse 3]
हम कहते हैं—
"जात-पात अब कहाँ रही?"
फिर शादी की बात आते ही—
"जात क्या है?"
कहते हैं—
"धर्म से क्या लेना-देना?"
फिर रिश्ता तय करते वक़्त
धर्म क्यों देखा जाता है?
कहते हैं—
"सब इंसान बराबर हैं।"
लेकिन नाम के पीछे
सरनेम दिख जाए...
तो सोच बदल जाती है।
पैसा हो तो कमी भी छुप जाती है।
पैसा न हो तो अच्छाई भी कम पड़ जाती है।
[Bridge]
और सबसे बड़ा झूठ?
"मैं ऐसा नहीं हूँ।"
रिश्वत ग़लत है...
जब तक मेरा का