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Dark Brass Beat
Electronic

Dark Brass Beat

BHARTI JAINBHARTI JAIN
0 likes1 plays6:31
Style: Heavy bass, Upbeat, male vocal, female vocal, powerful vocals, drums, bass, guitar, brass, dark

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दशलक्षण पर्व आया रे, खुशियों का रंग लाया रे, धर्म की ज्योति जलाएँ मिलकर, मन को आज सजाएँ रे। दशलक्षण पर्व आया रे, मंगल पर्व आया रे, जय जय जिनवर बोलो प्यारे, मन मंदिर महकाया रे। अंतरा 1 — उत्तम क्षमा क्रोध सभी मन से मिटा दें, सबको आज क्षमा कर दें, मन में कोई मैल न रखकर, प्रेम के दीप जला दें। छोटी-बड़ी भूलें जो हुईं, दिल से उन्हें भुलाएँ रे, दशलक्षण के पावन पर्व पर, क्षमा धर्म अपनाएँ रे। अंतरा 2 — उत्तम मार्दव मान-अभिमान छोड़कर अपने, विनम्र भाव अपनाएँ, छोटे-बड़े सब जीवों में हम, प्रभु का रूप निहारें। झुक जाए जो अहंकार अपना, जीवन सफल बनाए रे, मार्दव धर्म की राह पकड़कर, आत्मा को उजियारे रे। अंतरा 3 — उत्तम आर्जव मन में कुछ और, वचन में कुछ और, ऐसा भाव मिटाएँ, सीधा-सच्चा सरल बनाकर, जीवन पथ अपनाएँ। कपट छोड़कर सत्य के संग में, कदम बढ़ाएँ रे, आर्जव धर्म की सुंदर राह पर, आगे बढ़ते जाएँ रे। अंतरा 4 — उत्तम शौच लोभ-मोह की धूल हटाकर, अंतर मन निखराएँ, धन-दौलत सब यहीं रहेंगे, सत्य समझ हम पाएँ। निर्मल भावों से प्रभु चरणों में, अपना शीश झुकाएँ रे, शौच धर्म के पावन भावों से, जीवन को महकाएँ रे। अंतरा 5 — उत्तम सत्य मीठे बोल बोलें जग में, झूठ कभी न अपनाएँ, सत्य अहिंसा की राह पकड़कर, जीवन सफल बनाएँ। सच्चे वचनों की खुशबू से हम, जग को आज सजाएँ रे, उत्तम सत्य धर्म के संग में, प्रभु के पास ही जाएँ रे। अंतरा 6 — उत्तम संयम इंद्रियों को वश में करके, मन को शांत बनाएँ, जीव मात्र के प्रति करुणा रख, हिंसा दूर भगाएँ। संयम की सीढ़ी चढ़ते-चढ़ते, आत्मज्ञान पाएँ रे, उत्तम संयम के पावन पथ पर, कदम बढ़ाते जाएँ रे। अंतरा 7 — उत्तम तप तप की अग्नि में कर्म जलाकर, आत्मा को चमकाएँ, त्याग-तपस्या के सुंदर भावों से, जीवन सफल बनाएँ। तन को नहीं, मन को साधें, प्रभु गुण गाते जाएँ रे, उत्तम तप के पावन पर्व पर, भक्ति दीप जलाएँ रे। अंतरा 8 — उत्तम त्याग ममता-मोह की गाँठ खोलकर, त्याग भाव अपनाएँ, जो कुछ पाया प्रभु की देन है, ऐसा भाव जगाएँ। परहित में जीवन अर्पण करके, पुण्य कमाएँ रे, उत्तम त्याग धर्म को अपने, जीवन में बसाएँ रे। अंतरा 9 — उत्तम आकिंचन्य मेरा-मेरा छोड़ के प्राणी, खाली हाथ ही जाना, धन-दौलत और रिश्ते सारे, यहीं रह जाना। कुछ भी मेरा नहीं जगत में, सत्य यही समझाएँ रे, आकिंचन्य के पावन भाव से, मोह सभी मिटाएँ रे। अंतरा 10 — उत्तम ब्रह्मचर्य मन-वचन-काया पावन करके, आत्मा में रम जाना, इंद्रिय सुख से ऊपर उठकर, प्रभु का ध्यान लगाना। दशलक्षण के दस धर्मों से, जीवन सफल बनाएँ रे, मोक्ष मार्ग की ओर बढ़ें हम, जिनवाणी अपनाएँ रे। समापन: दशलक्षण पर्व आया रे, मंगल संदेश लाया रे, क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य धर्म समझाया रे। संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य, ब्रह्मचर्य अपनाएँ रे, जिनवर के चरणों में झुककर, भवसागर तर जाएँ रे। बोलो प्रेम से — जय जय जिनेन्द्र! दशलक्षण महापर्व की जय!

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