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Faysal KhanFaysal Khan
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Style: folk, acoustic guitar, vocals, harmonica, 95 bpm, storytelling, authentic, warm

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Lyrics

[INTRO] पत्तों की बाँसुरी, पाँवों में धरूँ, बजना ना, बजना ना ऐसे। अगन में जलूँ, मैं कैसे कहूँ, खो जाए तो मिल पाए मन? [CHORUS] बाँसुरी मुझे बस, देती विरह की चोट। बाँसुरी मुझे बस, देती विरह की चोट। क्यों आँख-मिचौली, क्यों इतनी तड़पन? [VERSE 1] पत्तों की बाँसुरी, पाँवों में धरूँ, बजना ना, बजना ना ऐसे। सुबह गई, फिर शाम भी ढली, संध्या आई हाय। मन का शिकारी, बंसीधारी, मुरली अपनी बजाए। सुबह गई, फिर शाम भी ढली, संध्या आई हाय। मन का शिकारी, बंसीधारी, मुरली अपनी बजाए। [PRE-CHORUS] सुर का कारीगर, छोड़ गया घर, जाना क्या इतना ज़रूरी? अगन में जलूँ, मैं कैसे कहूँ, खो जाए तो मिल पाए मन? [CHORUS] बाँसुरी मुझे बस, देती विरह की चोट। बाँसुरी मुझे बस, देती विरह की चोट। क्यों आँख-मिचौली, क्यों इतनी तड़पन? [VERSE 2] फूलों की ये कलियाँ, फूलों की ये कलियाँ, खिलकर खुद ही झर जाएँ। प्रीत अगर टूटे, विरह छोड़ जाए। केतकी-कदंब, हृदय मेरा, तेरे चरणों में धर दूँ। हिया थर-थर, धड़कन बढ़े, मधुर मिलन की घड़ी में। [BRIDGE] आँखों के आँसू थामूँ, सहता नहीं मन का दर्द। सहती नहीं ये पीड़ा। चिर अभागी, तेरे ही खातिर, मरने से पहले मर गई। [FINAL CHORUS] अगन में जलूँ, मैं कैसे कहूँ, खो जाए तो मिल पाए मन? बाँसुरी मुझे बस, देती विरह की चोट। बाँसुरी मुझे बस, देती विरह की चोट। क्यों आँख-मिचौली, क्यों इतनी तड़पन? [OUTRO] पत्तों की बाँसुरी, पाँवों में धरूँ, बजना ना, बजना ना ऐसे।

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