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Lyrics
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बंसी की धुन फिर बज उठी,
कान्हा का संदेश आया है,
जब-जब बढ़ता है धरती पर,
अन्याय मिटाने कोई आया है।
जब-जब बढ़ा है अधर्म यहाँ,
जब-जब रोई है कोई नारी,
कान्हा फिर किसी रूप में आए,
बनकर उसकी रक्षा की तैयारी।
लाल नकाब में छिपा हुआ,
एक चेहरा अनजान है,
कलियुग की इस अंधेरी रात में,
फिर आया कोई कान्हा है।
ओ कान्हा… ओ कान्हा…
फिर आया है कान्हा…
जब सभा में द्रौपदी रोई,
जब सबने मुँह मोड़ लिया,
उसकी लाज बचाने कान्हा ने,
हर मुश्किल से नाता जोड़ लिया।
आज भी जब कोई बेटी,
डर के साये में जीती है,
कहीं अंधेरी गलियों में,
एक उम्मीद उसकी जीती है।
कलियुग की इस अंधेरी रात में,
एक लाल निशान उभरता है,
जो खुद को हीरो नहीं कहता,
बस अत्याचार से लड़ता है।
ना कोई नाम, ना पहचान,
ना दुनिया से सम्मान चाहिए,
जिसकी आँखों में अन्याय दिखे,
उसे बस इंसाफ चाहिए।
जब बेटियों पर संकट आए,
जब इंसानियत शर्माए,
अंधेरे से निकलकर कोई,
बुराई को ललकार जाए।
वो कृष्ण नहीं…
पर कृष्ण की सीख है!
वो भगवान नहीं…
पर अन्याय के खिलाफ है!
लाल नकाब उसका चेहरा है!
दर्द उसकी पहचान है!
वो कोई सुपरहीरो नहीं…
वो एक आम इंसान है!
किसी ने उसे भगवान माना,
किसी ने रक्षक का नाम दिया,
पर किसी ने उसके दिल में,
छिपा हुआ वो दर्द नहीं देखा।
जिसने अपनी खुशियाँ खोकर,
किसी और का घर बचाया,
जिसने अपने आँसू पीकर,
दुनिया को हँसना सिखाया।
सतयुग में कान्हा आए थे,
धर्म की राह दिखाने को,
कलियुग में एक साया निकला,
डर को दूर भगाने को।
जब-जब बढ़ेगा अन्याय यहाँ,
जब-जब रोएगा संसार,
कहीं न कहीं फिर उठेगा,
न्याय का कोई अवतार।
कलियुग का कान्हा आया है!
अंधेरा मिटाने आया है!
लाल नकाब में छिपा हुआ,
इंसाफ जगाने आया है!
न कोई ताज…
न कोई सिंहासन…
बस दर्द भरे उस दिल में…
जिंदा है इंसानियत!
जब तक धरती पर अन्याय रहेगा…
जब तक किसी की आँखों में डर रहेगा…
तब तक…
कहीं अंधेरे में…
कोई जागता रहेगा…
THE OUTRAGE…