
Raaga Dhyaan
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नव रसमय शिव
शिवोऽहम् शिवोऽहम् शिवोऽहम्
श्रृंगार रस है शिव
प्रेम और सुंदरता का प्रतीक
गले में धारण करते सर्पों की माला
घुंघराली जटाओं का मुकुट निराला
केश विन्यास में शशि भूषण
साथ में शोभित निर्मल गंगा
बाजू और कलाई सजे रुद्राक्ष
कंठ में नील वर्ण की आभा
वस्त्रों में बाघ अंबर धरा
मोहित करती यह अद्भुत शिव प्रतिमा
शिवोऽहम् शिवोऽहम् शिवोऽहम्
पार्वती को ब्याहन चले जब
लिए हाथ में डमरू और त्रिशूल
मारने तोरण चढ़ बैल अपने में मशगूल
दूल्हा शिव संग विचित्र बारात
अप्सराएँ बोलीं देख अजूबी माया
क्या होगी इस दूल्हे योग्य दुल्हन की काया
देवता चढ़ अपने वाहन शामिल होने बारात
जब देख दूल्हे की अनोखी बारात
हंस के चले अपने दल संग
जो पाया नहीं स्वयं को सम बारात
शिव संग अपने शिवगण
बेपरवाह मदमस्त चले हर्षित
ब्याहने हिम मैना पुत्री पार्वती
शिवोऽहम् शिवोऽहम् शिवोऽहम्
सती जब न कर पाई यह स्वीकार
महादेव का यज्ञ में न था भाग
इसी अपमान में कर लिया
स्वयं अग्नि को अंगीकार
सती के पावन देह को कांधे ले
अर्धांगिनी के वियोग में बन योगी
घूमे शिव पूरे ब्रह्मांड में
द्रवित हृदय, ले लीन हुए वर्षों की समाधि में
दुख से उन्मत्त ये हैं करुणा सागर शिव
शिवोऽहम् शिवोऽहम् शिवोऽहम्
मायामयी शहर त्रिपुरा
घूमते नभ में तीन पुर
वरदान में पाया ब्रह्माजी से
कर तपस्या तारकासुर पुत्रों ने
इन गतिशील पुरो का विध्वंस
विशिष्ट क्षण में सम्भव था
तीनों पुर का विनाश
संभव हुआ एक तीर से
जो साधा था पराक्रमी शिव ने
जब क्षणिक आए तीनों पुर एक सीध में
शिवोऽहम् शिवोऽहम् शिवोऽहम्
जब गोद में ले सती देह
जो भस्म हो गई थी यज्ञाग्नि में
अत्यंत क्रुद्ध हो विरह अग्नि में
असहय दुख और गुस्से में
"रौद्र तांडव" शिव करने लगे
संपूर्ण ब्रह्मांड भयभीत हो कांप गया
शिव ने जो रौद्र रूप दिखलाया
शिवोऽहम् शिवोऽहम् शिवोऽहम्
जब प्रसन्न हुए भक्त के तप से
नाम था जिसका भस्मासुर
ऐसा दे दिया वरदान उसे
होगा भस्म जिसके सिर पर वो हाथ रखे
ले शिव से वरदान चला वो दुष्ट
शिव को ही उनके दिए वरदान से भस्म करने
भयभीत हुए अब शिव जो
छिप छिपते डर में स्वयं जीकर
बतला गए कि भय सबको प्यार व्यापे
शिवोऽहम् शिवोऽहम् शिवोऽहम्
समाधि लगाए ध्यान में बैठे
थे तपस्या मे लीन, शिव
आम्र शाखा की ओट में छोड़े पुष्प बाण
कामदेव ने जानकर भी किया ऐसा काम
तपस्या भंग, हुए महादेव वीभत्स ,ले घृणा अपार
तीसरा नेत्र खोल, कर दिया
मीनकेतु मदन को भवसागर पार
शिवोऽहम् शिवोऽहम् शिवोऽहम्
अर्द्धनारीश्वर रूप धर
विस्मित सब को कर दिया
ये रूप ही क्या कम था
जो वेग से बहती पावन गंगा को
जटाओं में धारण कर शांत किया
अद्भुत है शिव जो करते सबको विस्मित
शिवोऽहम् शिवोऽहम् शिवोऽहम्
कैलाश पर वट के तले
जब लगायी अखंड समाधि
पद्मासन में बैठे त्रिनेत्र धारी
जटाओं में समाई मंदाकिनी
हस्त धारण त्रिशूल और डमरू
मस्तक सुशोभित दूज का मनोमय चंद्र
सो नाम पड़ा शशिभूषण
जो हैं शांत सरल सदाशिव
शिव सम्पूर्ण सृष्टि हैं
शिव ही संपूर्ण जीवन
सब रस का समावेश शिव में
अनादि अनंत आदिपुरुष आदियोगी स्वयंभू
को कोटि प्रणाम
शिवोऽहम् शिवोऽहम् शिवोऽहम्