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विराट चेतावनी
Classical

विराट चेतावनी

Antriksha UpadhyayAntriksha Upadhyay
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Lyrics

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(हो...)

वन की धूल से लौटे वीर

भाग्य अभी जागेगा फिर

वर्षों वन में चले पांडव

धूप-पत्थर सहकर निखरे

मैत्री का संदेश लिए

माधव सभा के द्वार उतरे

आधा न्याय भी दे दो

नहीं तो पाँच ग्राम ही दो

याचना नहीं Ab रण होगा

जीवन-जय या मरण होगा

कृष्ण की चेतावनी सुन लो

(सुन लो, सुन लो)

धर्म जले तो रण होगा

दुर्योधन ने बात न मानी

अहंकार ने आँख ढँकी

हरि को बाँधने चला वह

अपनी ही बुद्धि फिर भटकी

जब विनाश निकट आता

पहले विवेक मर जाता

याचना नहीं Ab रण होगा

जीवन-जय या मरण होगा

कृष्ण की चेतावनी सुन लो

(रण होगा, रण होगा)

धर्म जले तो रण होगा

मुझमें गगन, मुझमें पवन

मुझमें ही संसार सकल

देख मेरा विराट स्वरूप

(जय-जय, जय-जय)

याचना नहीं Ab रण होगा

जीवन-जय या मरण होगा

दुर्योधन अब सुन ले तू

(सुन ले तू, सुन ले तू)

धर्म रहे तो जग होगा

सभा सन्न, नभ भी थर्राया

विदुर ने जय-जय गाया

(जय-जय... जय-जय...)

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