
Pramaan Kahan
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Lyrics
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सुन भाई...
आज कहानी ना, सवाल है।
धर्म के नाम पे जो कुछ बताया गया,
उसका जवाब भी कमाल है।
कान खोल...
ध्यान लगा...
शुरू करें?
नियोगदर्शी!
दयानंद महर्षि मेरा नाम,
धर्म के नाम पर पाखण्ड फैलाना मेरा काम।
मेरी पोल वही खोल पाएगा,
जो लेगा पूरे गुरु का ज्ञान।
अपने ज्ञान का सहारा लेके,
नियम एक ऐसा बनाया,
विदेश ते जो साल तीन ना आवे,
गोदी में उसके लाल दिखाया।
बोल—
कैसा ये नियम?
कैसा विधान?
किस बात का ज्ञान?
किस बात का मान?
किताब उठाई,
बात सुनाई,
अब सुन भाई ध्यान लगाई,
नियोग की ये कैसी परिभाषा,
कहाँ से आई, किसने बताई?
रुक...
अभी कहानी बाकी है।
नियोग दूसरा विस्तार ते बताऊँ,
दोनों कान खोल के सुन,
विधवा हो जाए तो पुनर्विवाह ना,
ऐसा नियम बताएँ चुन-चुन।
ग्यारह पुरुषां गैल नियोग कराऊँ,
फिर इसका कराऊँ प्रचार,
ऐसी बातों को धर्म बताकर,
बनने चला महान प्रचारक।
सवाल उठे तो जवाब कहाँ?
प्रमाण मिले तो हिसाब कहाँ?
कहने भर से सत्य ना बनता,
शास्त्रों में उसका प्रमाण कहाँ?
बोल...
प्रमाण कहाँ?
अब तीसरी बात भी सुन ले,
ध्यान से मेरी बात,
हथिनी और हंसिनी जैसी,
चाल हो जिसकी खास।
ऐसी युवती ते विवाह रचाओ,
नहीं तो कुँवारे मर जाओ,
ये कैसी दी गई सलाह,
अब तुम खुद विचार लगाओ।
चेहरा देखा?
चाल भी देखी?
फिर जीवन भर का फैसला?
सोचो भाई...
ये कैसा पैमाना?
किस ज्ञान का ये सिलसिला?
एक सवाल...
दूसरा सवाल...
तीसरा सवाल...
और जवाब?
चलते-चलते बात बताऊँ,
अब आखिरी राज सुनाऊँ,
ज्ञान की हवा जब चल पड़ी,
तो बात कहाँ तक जाऊँ?
रामपाल एक संत आयेगा,
वाको तुम छेड़ियो मत,
वो खुद अवतार कबीर आयेगा,
जो आगे आयेगा, वो मिट्टी में मिल जाएगा।
सत्य की बात अगर सामने आए,
फिर उससे मुँह मोड़ियो मत।
शास्त्र सामने रखकर पूछे,
बात-बात का दे प्रमाण।
फिर बहस नहीं, फैसला होगा,
कौन सही और कौन अज्ञान।
मर्म आदि राम का तभी जन पाएगा,
जब सत्य को शास्त्रों से पहचान पाएगा।
अब देख...
कहानी कहाँ पहुँच गई,
जिस बात को दबाया था,
वही सामने आ गई।
नियोग की बातें,
नियमों की बातें,
धर्म के नाम की सारी बातें।
एक-एक करके रख दे सामने,
फिर करियो अपने मन की बातें।
सत्य...
शास्त्र...
प्रमाण...
और आखिरी सवाल—
आर्य समाज...
गया कहाँ?
सोचियो...
सिर्फ सुनियो मत।