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حلم فوق البحر
Folk

حلم فوق البحر

Aziz AhfirAziz Ahfir
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(हो...)

राहों पे धूल सी छाई

आँखों में टूटी परछाई

घर से चला बोझ उठाए

दिल में सौ तूफ़ान छुपाए

सामने समुंदर गहरा

पीछे डर का साया ठहरा

रोटी की चाह में निकला

अपनों से दूर भी फिसला

सोचा परदेस बदलेगा

सूना सा दिन संभलेगा

अल्लाह करे राहें आसान

टूटे न उसका अरमान

दूर सफ़र पर निकला इंसान

(उसका अरमान)

उसको मिले इक नया जहान

हिजरत केवल सफ़र नहीं

ये दर्द है जो कमतर नहीं

दूर वतन को देखे मन

फिर भी वहीं अटका जीवन

रात बहुत लंबी लगती

तन्हाई भीतर ही जगती

फिर भी उम्मीदें कहतीं

कल की किरनें बहतीं

अल्लाह करे राहें आसान

टूटे न उसका अरमान

दूर सफ़र पर निकला इंसान

(राहें आसान)

उसको मिले इक नया जहान

हर कोई भागा नहीं है

कुछ ने बस कल माँगा है

मुट्ठी में थोड़ा उजियारा

(थोड़ा उजियारा)

अल्लाह करे राहें आसान

टूटे न उसका अरमान

दूर सफ़र पर निकला इंसान

(उसका अरमान)

उसको मिले इक नया जहान

मंज़िल उसे मिल जाए

(हो... मिल जाए)

रब उसकी सुन जाए

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