
Midnight Zikr
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Lyrics
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वक़्त की हथेली से
कुछ लम्हे फिसल गए…
कुछ ख़्वाब आँखों में थे,
कुछ आँखों से निकल गए…
उम्र ने पूछा मुझसे—
“अब कितना बाक़ी है?”
मैंने कहा—
“जितना चल रहा हूँ…”
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ये कैसी राह है, मंज़िल का कुछ पता नहीं,
चल रहा हूँ मगर दिल में कोई दुआ नहीं।
कुछ अरमाँ थे जो ख़ामोशी में दफ़्न हो गए,
कुछ अपने थे… मगर अपने कभी थे ही नहीं।
हर सुबह मुझसे कुछ छीन के चली जाती है,
हर शाम मेरी तन्हाई मुझे बुलाती है।
मैं हँसता हूँ मगर आँखों में रात रहती है,
मेरे अंदर कोई चुपचाप रोता रहता है।
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वक़्त गुज़रता गया… मैं ठहरता गया,
कुछ ख़्वाब मरते गए… मैं बिखरता गया।
फिर भी कोई उम्मीद सीने में ज़िंदा रही,
मैं टूटता ही रहा… मगर चलता गया।
किससे कहूँ ये दर्द,
कौन सुनेगा यहाँ?
कौन दो क़दम चलेगा
मेरे साथ यहाँ?
वक़्त गुज़रता गया…
और मैं चलता गया…
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कितनी ख़्वाहिशों को मैंने ख़ामोश किया,
कितनी रातों को सुबह होने से पहले खो दिया।
जो मिला नहीं, उसका मातम भी क्या करना,
जो बचा है उसे भी तो है हासिल करना।
दिल के किसी कोने में
अब भी एक चराग़ है,
बुझते हुए ख़्वाबों में
वो आख़िरी ख़्वाब है।
वो कहता है—
“थक गया है तो रुक मत,
बस थोड़ा सा साँस ले…
फिर चल।”
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वक़्त गुज़रता गया… मैं ठहरता गया,
कुछ ख़्वाब मरते गए… मैं बिखरता गया।
फिर भी कोई उम्मीद सीने में ज़िंदा रही,
मैं टूटता ही रहा… मगर चलता गया।
कोई अपना नहीं,
कोई हमसफ़र नहीं,
फिर भी दिल कहता है—
“सफ़र ख़त्म नहीं…”
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कभी-कभी लगता है—
काश कोई होता…
जिससे कह देता,
“आज बहुत थक गया हूँ…”
जो मंज़िल तक नहीं,
बस कुछ दूर चलता…
मेरे साथ नहीं—
मेरी तन्हाई के साथ।
मगर कोई नहीं आया…
तो अपने दर्द को ही
अपना हमसफ़र बना लिया।
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वक़्त गुज़रता गया… मैं सँवरता गया,
ज़ख़्म गहरे थे फिर भी निखरता गया।
जिन दुआओं का कोई जवाब आया नहीं,
उन दुआओं के सहारे भी चलता गया।
ज़िंदगी हारती रही… मैं लड़ता रहा,
जो बुझ गए ख़्वाब… उन्हें जाने दिया।
एक उम्मीद बची थी सीने में कहीं—
उसे थाम लिया… और चलता गया।
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कुछ ख़्वाब मर गए…
कुछ अरमाँ सो गए…
मगर एक उम्मीद…
अभी ज़िंदा है।
और जब तक वो ज़िंदा है…
मैं चलता रहूँगा।