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**[Intro — धीमा, सिनेमैटिक]**
बर्फ़ों के नीचे दबी, कुछ आवाज़ें आज भी हैं,
झेलम की लहरों में, कुछ सवाल आज भी हैं।
कश्मीर सिर्फ़ नक्शे की कोई लकीर नहीं,
ये घर है किसी का, किसी की तक़दीर सही।
सियासत के पन्नों में इतिहास लिखा गया,
हर दौर में इस घाटी का इम्तिहान लिया गया।
मगर सुन—ये गाना नफ़रत की बात नहीं,
ये उन लोगों की आवाज़ है, जिनकी रात नहीं गई।
**[Hook / Chorus]**
कश्मीर की वादियों से पूछ, क्या चाहती हैं हवाएँ?
बंदूक नहीं, अमन की धुन, फिर से क्यों न गाएँ?
सीमा की लकीरों से दिल बँटते नहीं,
इंसान हैं पहले हम—नामों से बदलते नहीं।
कश्मीर... कश्मीर...
एक ज़ख्म भी, एक उम्मीद भी,
कश्मीर... कश्मीर...
एक कहानी अधूरी, एक नई शुरुआत भी।
**[Verse 1 — इतिहास और संघर्ष]**
सैंतालीस का साल था, बँट गया हिंदुस्तान,
साथ में बँटे घर, रिश्ते, यादें और अरमान।
रियासतों के फैसले, सरहदों का निर्माण,
कश्मीर बना फिर सदियों के सवालों का मैदान।
फिर आए संघर्ष, फिर बढ़ती गई दूरियाँ,
पीढ़ियों ने देखीं बंद खिड़कियाँ, मजबूरियाँ।
किसी ने खोया अपना घर, किसी ने अपना यार,
किसी माँ की आँखों में आज भी इंतज़ार।
सियासत के फैसले, जनता के सवाल,
हर तरफ़ अलग-अलग सच, अलग-अलग ख़याल।
किसकी कहानी पूरी, किसका सच अधूरा?
इतिहास का हर पन्ना क्यों लगता है इतना धुँधला?
मैं किसी एक तरफ़ का नारा लेकर नहीं आया,
मैंने बस इंसान का दर्द कागज़ पर सजाया।
क्योंकि घाटी में रहने वाला हर इंसान जानता है,
सुकून की कीमत वो सबसे ज़्यादा पहचानता है।
**[Hook]**
कश्मीर की वादियों से पूछ, क्या चाहती हैं हवाएँ?
बंदूक नहीं, अमन की धुन, फिर से क्यों न गाएँ?
सीमा की लकीरों से दिल बँटते नहीं,
इंसान हैं पहले हम—नामों से बदलते नहीं।
कश्मीर... कश्मीर...
एक ज़ख्म भी, एक उम्मीद भी,
कश्मीर... कश्मीर...
एक कहानी अधूरी, एक नई शुरुआत भी।
**[Verse 2 — आम लोगों की आवाज़]**
सुबह का सूरज निकले, बच्चे स्कूल को जाएँ,
बाग़ों में फिर से हँसी हो, शिकारे गीत सुनाएँ।
सेबों की ख़ुशबू हो, बाज़ारों में रौनक हो,
हर चेहरे पर डर नहीं, जीने की चमक हो।
एक तरफ़ सैनिक खड़ा, कर्तव्य लिए सीने में,
दूसरी तरफ़ माँ दुआ लिए अपने बेटे के लिए।
हर किसी की अपनी कहानी, अपना दर्द, अपना डर,
क्यों न एक दिन ये घाटी सिर्फ़ शांति की खबर?
न जवान दुश्मन है, न आम इंसान निशाना,
न किसी मज़हब से तय होता है इंसान का फ़साना।
हिंदू हो या मुस्लिम, सिख हो या कोई और,
हर माँ की आँखों में एक जैसा होता है भोर।
नफ़रत के सौदागर बहुत बातें बनाएँगे,
पुराने ज़ख्मों को बार-बार फिर से कुरेदेंगे।
पर नई पीढ़ी अगर इतिहास से कुछ सीख पाए,
तो शायद आने वाले कल में कोई घर न जलाए।
**[Bridge — भावुक, धीमा]**
किसी बच्चे से पूछो—उसे सरहद क्या लगती है?
वो बोलेगा, “मुझे तो बस पतंग उड़ानी आती है।”
किसी माँ से पूछो—उसे राजनीति क्या देती है?
वो कहेगी, “मेरा बेटा लौट आए, बस यही खुशी देती है।”
तो चलो सवाल बदलें,
किसने जीता, किसने हारा—ये हिसाब रहने दो।
जो खो गया, उसे याद रखो,
जो बचा है, उसे आबाद रहने दो।
**[Verse 3 — आज और भविष्य]**
वक़्त बदला, कानून बदले, हालात भी बदले,
कश्मीर के राजनीतिक नक्शे और हालात भी बदले।
लेकिन बदलाव का मतलब सिर्फ़ कागज़ नहीं,
ज़मीन पर इंसाफ़ और भरोसा भी ज़रूरी है कहीं।
विकास हो, रोज़गार हो, शिक्षा का विस्तार,
युवाओं के हाथ में किताबें हों, बेहतर हो संसार।
पर्यटन लौटे, कारोबार बढ़े, खेतों में फसलें हों,
हर घर में सपने हों, और आँखों में मंज़िलें हों।
जो विस्थापित हुए, उनके दर्द को भी सुनना,
जो वहीं रहे, उनकी चिंताओं को भी चुनना।
हर समुदाय की यादों को सम्मान मिले,
तभी तो टूटे रिश्तों को फिर से मुकाम मिले।
कश्मीर कोई ट्रॉफी नहीं जिसे जीत लिया जाए,
ये ज़िंदा लोगों का घर है—इसे घर ही रहने जाए।
राजनीति अपनी जगह, सीमाएँ अपनी जगह,
पर इंसानियत की आवाज़ रहे सबसे ऊपर सदा।
**[Final Hook — बड़ा, ऊर्जावान]**
कश्मीर की वादियों से पूछ, क्या चाहती हैं हवाएँ?
बंदूक नहीं, अमन की धुन, फिर से क्यों न गाएँ?
सीमा की लकीरों से दिल बँटते नहीं,
इंसान हैं पहले हम—नामों से बदलते नहीं।
कश्मीर... कश्मीर...
तेरी ख़ामोशी भी एक सवाल है,
कश्मीर... कश्मीर...
तेरी हर सुबह में नया ख़याल है।
कल अगर बच्चे पूछें—“क्यों था इतना फ़ासला?”
हम कहें—“गलतियों से सीखा, फिर चुना था रास्ता।”
नफ़रत की विरासत अब आगे नहीं बढ़ाएँगे,
टूटे हुए कल से बेहतर कल बनाएँगे।
**[Outro — धीमा]**
बर्फ़ पिघलेगी...
झेलम फिर गाएगी...
वादियाँ फिर मुस्कुराएँगी...
कश्मीर सिर्फ़ एक मुद्दा नहीं—
किसी का घर है।
और हर घर की सबसे बड़ी ज़रूरत...
**अमन है।**