
Shyam Murari
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Lyrics
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विविध सुमन मन फूलें डार,
उनमत मधुकर भ्रमर अपार।
जागिये बृजराज कुवर कुसुम कमल फूले,
कुमुद संकुचित भृंग लता झूले।
पिया बिनु सांपिन कारी रात,
सूर श्याम बिन बिकल बिरहणी, मुर-मुर लहरें खात।
कीजै कृपादृष्टि की बरषा, जन की जाति लुनाई,
सूरदास की प्रभु सौ बिनती, होई न कान-कटाई।
जसोदा हरि पालनैं झुलावै,
मेरे लाल कौं आउ निंदरिया, काहैं न आनि सुवावै।
जसुमति मन अभिलाष करै,
कब मेरे लाल घुटवनि रेगें, कब धरनी पग दुई धरै।
मैया मैं नहिं माखन खायो,
ख्याल परे ये सखा सबै मिलि, मेरे मुख लपटायो।
रे मन आपु कौ पहिचानी,
सब जनम तै भ्रमत रह्यों, आजहूँ तो कछु जानि।
करी गोपाल की सब होई,
जो अपनो पुरुषारथ मानत, अति झूठों है सोई।
खेलत रहो मैं बाहर, चीपतै रहति सब मोरि ओर,
बोलि लेती भीतर घर अपनै, मुख चूमती भरी लेती अंकोर।
बुझत स्याम कौन तू गोरी?
कहा रहती, काकी है बेटी, देखी नहीं कहूँ ब्रज खोरी।
निसि दिन बरसत नैन हमारे,
सदा रहतीं पावस रितु हमपै, जबते स्याम सिधारै।
अति मालिन वृषभानु कुमारी,
हरि-स्रमजल अंतर-तन भीजे, ता लालच न धुआवति सारी।
जहँ जहँ रहो राज करौ,
तहँ तहँ लेहु कोटि सिर भार।
निरगुन कौन देस को बासी,
कैसे बरन भेस है कैसो, रस में अभिलासी?
आयो घोष बड़ों व्यापारी,
लादी खेप गुन ग्यान जोग की, ब्रज में आय उतारी।
सुनि सुनि ऊधौ प्रेम मगन भयो,
लोटत घर पर ज्ञान गर्व गयौ।
ऊधो मन न भए दस बीस,
एक हुतौ सो गयो स्याम संग, को अवराधे ईस।
प्रकृति जो जाके अंग परी,
स्वान पुंछ कोऊ कोटिक लागे, सुधि कहूँ न करी।
उत्तम पद कवि गंग के, उपमा में बलवीर,
केशव अर्थ गँभीर को, सूर तीन गुन धीर।
मेरी कौन गति बृजनाथ,
भजन बिनु अरु शरण नाही, फिरत विषया साथ।
कहन लागे मोहन मैया मैया,
प्रभु तुम्हरे दास कों चरननि की बलि जैयाँ।
हरि हैं राजनीति पढ़ि आए,
जानी बुद्धि बड़ी जुवतिन को, जोग-सँदेस पठाए॥
मधुबन तुम क्यौं रहत हरे?
बिरह बियोग स्याम सुंदर के, तूं क्यौं न जरे?